क्या इंसानियत अब भी ज़िंदा है: डॉ. मोहम्मद शोएब
एक राहत की सांस तो ज़रूर आई है , ईरान और इज़राइल के बीच चल रही तल्ख़ी के बाद फिलहाल सीज़फायर हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या गोलियों और मिसाइलों का रुक जाना ही अमन है? क्या इंसानियत की जो लाशें मलबों के नीचे दब गईं, उन्हें अब भी कोई देखेगा? ग़ज़ा में हालात दिल दहला देने वाले हैं। बमबारी में मारे गए अधिकतर लोग वो थे जो कतार में खड़े थे , एक रोटी, एक मुट्ठी चावल, या सिर्फ पानी की एक बोतल के लिए। स्कूल, अस्पताल, मस्जिद — किसी जगह को नहीं छोड़ा गया। और यह सब उस दौर में हो रहा है जब दुनिया सबसे ज़्यादा ‘सभ्य’ होने का दावा करती है। मुझे यह सोचकर तकलीफ़ होती है कि बच्चों की लाशों को गोद में लिए मांएं कुछ कह नहीं रहीं, सिर्फ देख रही हैं। क्या यही वह भविष्य है, जिसे हम अपनी चुप्पी से स्वीकार कर रहे हैं? ईरान और इज़राइल के बीच सीधा टकराव, और फिर वैश्विक दबाव में आया यह सीज़फायर — यह दिखाता है कि जब दुनिया चाहे, तब जंग रोकी जा सकती है। पर क्या हम चाहते हैं? या हम बस खून को तमाशे की तरह देखने के आदी हो चुके हैं? हिंदुस्तान की सरज़मीं से मैं यह कहना चाहता हूँ: हमारी परंपरा रही है शांति और इंसाफ की। आज ज़रूरत है कि हम अपने उस किरदार को फिर से दुनिया के सामने रखें। हमारी संसद, हमारा संविधान, और हमारी अवाम — सबको मिलकर इस बात को कहना होगा कि अब नहीं। अब बच्चों की लाशों पर राजनीति नहीं। अब अस्पतालों पर बमबारी नहीं। अब धर्म के नाम पर क़त्ल नहीं। युद्ध कभी किसी का नहीं होता, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम जनता चुकाती है। मैं खासतौर पर नौजवानों से कहता हूँ — खामोश मत रहिए। बोलिए। लिखिए। सोचिए। इंसानियत के साथ खड़े होइए। क्योंकि जो जुल्म के वक्त खामोश रहता है, वो जालिम से कम नहीं होता।
डॉ. मोहम्मद शोएब
(प्रदेश सचिव, राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी)
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