अंता विधानसभा सीट पर रोचक चुनावी मुकाबला
प्रमोद जैन भाया की बढ़ी मुश्किलें
बारां। राजस्थान की राजनीति में इस वक्त बारां ज़िले की अंता विधानसभा सीट पर हो रहा उपचुनाव चर्चा का विषय बना हुआ है। बीजेपी विधायक की सदस्यता रद्द होने के कारण यह सीट खाली हुई है। इस बार यहाँ का मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, यानी तीन उम्मीदवारों के बीच कांटे की टक्कर है, जिससे चुनाव का नतीजा किसी भी तरफ जा सकता है। चलिए, इस पूरे चुनावी गणित को आसान भाषा में समझते हैं।चुनावी मैदान में प्रमोद जैन भाया कांग्रेस से, मोरपाल सुमन भाजपा से एवं नरेश मीणा निर्दलीय के बीच में मुकाबला है।
- प्रमोद जैन भाया (कांग्रेस) – कांग्रेस ने अपने सबसे अनुभवी और पुराने खिलाड़ी पर ही दांव खेला है। प्रमोद जैन भाया को अंता की राजनीति का “पुराना चावल” कहा जाता है।
ताकत क्या है?
अनुभव और पहचान: वह दो बार विधायक और राजस्थान सरकार में खान एवं गोपालन मंत्री रह चुके हैं। क्षेत्र का बच्चा-बच्चा उन्हें भाया नाम से जानता है। उनके पास एक मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क और चुनाव लड़ने का लंबा अनुभव है।
पक्का वोट बैंक: अनुसूचित जाति (SC) और मुस्लिम समुदाय परंपरागत रूप से कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं। भाया को उम्मीद है कि यह वोट बैंक इस बार भी उनका साथ देगा।
कमजोरी क्या है?
अवैध खनन का मामला: हाल ही में उन पर अवैध मिट्टी खनन के जरिए सरकार को करोड़ों का नुकसान पहुँचाने का जो मामला दर्ज हुआ है, वह उनके लिए गले की फांस बन गया है। बीजेपी इसे “भ्रष्टाचार” का बड़ा मुद्दा बनाकर उन पर लगातार हमला कर रही है।
मीणा वोटों का खिसकना: नरेश मीणा के मैदान में आने से कांग्रेस के सबसे बड़े वोट बैंक (मीणा समुदाय) में सीधी सेंध लग रही है, जो भाया की जीत का समीकरण बिगाड़ सकता है।
- मोरपाल सुमन (बीजेपी) – बीजेपी ने इस बार एक नए, लेकिन सधे हुए दांव के साथ मोरपाल सुमन को मैदान में उतारा है।
ताकत क्या है?
बेदाग छवि: प्रमोद जैन भाया के ठीक विपरीत, मोरपाल सुमन की छवि बिल्कुल साफ-सुथरी है। उन पर कोई बड़ा आपराधिक या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। बीजेपी उन्हें “ईमानदार विकल्प” के तौर पर पेश कर रही है।
जातीय समीकरण: वह माली (सैनी) समुदाय से आते हैं, जो अंता में सबसे बड़ा और निर्णायक वोट बैंक है। बीजेपी को उम्मीद है कि माली समाज का वोट एकमुश्त होकर उन्हीं को मिलेगा।
सत्ता का साथ: राज्य में बीजेपी की सरकार होने का फायदा भी उन्हें मिलेगा।
कमजोरी क्या है?
अनुभव की कमी: विरोधी उन पर यह कहकर हमला कर रहे हैं कि उनके पास विधायक स्तर का कोई अनुभव नहीं है। उनकी पहचान पूरे विधानसभा क्षेत्र में उतनी नहीं है, जितनी प्रमोद जैन भाया की है।
पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी: पुराने विधायक के समर्थकों की नाराजगी भी उनके लिए एक छिपी हुई चुनौती हो सकती है।
- नरेश मीणा (निर्दलीय)- इस चुनाव के सबसे चर्चित और अप्रत्याशित चेहरे नरेश मीणा हैं। वह युवा हैं, जोशीले हैं, लेकिन उनका अतीत विवादों से भरा रहा है।
ताकत: युवाओं और मीणा समाज में पकड़: उन्होंने छात्र और युवा आंदोलनों से अपनी पहचान बनाई है। मीणा समुदाय के युवाओं में उनकी अच्छी-खासी पैठ है।
बागी तेवर: उनका कांग्रेस से बगावत करके लड़ना उन्हें एक “सिस्टम से लड़ने वाले” नेता की छवि देता है।
कमजोरी और बड़े विवाद:
देवली-उनियारा का चर्चित ‘थप्पड़ कांड’: नरेश मीणा का नाम सबसे बड़े विवाद से तब जुड़ा, जब उन्होंने देवली-उनियारा उपचुनाव के दौरान एक SDM को थप्पड़ जड़ दिया था। मीणा ने उस वक्त अधिकारी पर फर्जी वोटिंग कराने का गंभीर आरोप लगाया था। इस घटना के बाद बवाल मच गया था, जिसके विरोध में RAS अधिकारियों ने पेन-डाउन हड़ताल कर दी थी और बाद में नरेश मीणा को गिरफ्तार भी कर लिया गया था।
“वोटकटवा” का ठप्पा: उन पर सबसे बड़ा आरोप यही लग रहा है कि वह जीतने के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस के मीणा वोट काटकर बीजेपी को जिताने के लिए मैदान में हैं।
सबसे ज़रूरी बात: जातियों का पूरा गणित समझिए-
अंता में जीत और हार का असली फैसला जातियों के वोटों से होता हैं। यहाँ कुल मिलाकर करीब 2.25 लाख वोटर हैं, जिनमें से चार जातियाँ सबसे अहम हैं।
माली (सैनी): लगभग 40,000 से 45,000 वोट।
अनुसूचित जाति (SC): लगभग 35,000 वोट।
मीणा (ST): लगभग 30,000 से 32,000 वोट।
मुस्लिम: लगभग 25,000 से 28,000 वोट।
अब समझिए पार्टियों का समीकरण:
बीजेपी का समीकरण: बीजेपी का दांव सीधा है। उन्होंने माली समाज के मोरपाल सुमन को उतारा है। उनकी कोशिश है कि 40-45 हजार माली वोटों को एक साथ लाया जाए और साथ में पार्टी के परंपरागत शहरी वोट जोड़कर जीत हासिल की जाए। कांग्रेस का पारंपरिक समीकरण: कांग्रेस अब तक मीणा (32 हजार), एससी (35 हजार) और मुस्लिम (25 हजार) वोटों को मिलाकर एक मजबूत गठजोड़ बनाती आई है। इन तीनों को मिला दें तो यह आंकड़ा 90 हजार के पार चला जाता है, जो जीत के लिए काफी होता है।
पेंच कहाँ है?: सारा खेल बिगाड़ रहे हैं निर्दलीय नरेश मीणा। वह खुद मीणा हैं और अगर वह 32,000 मीणा वोटों में से 20-25 हजार वोट भी ले जाते हैं, तो कांग्रेस का पूरा समीकरण बिगड़ जाएगा। कांग्रेस का जो जीता-जिताया गठजोड़ था, वह टूट जाएगा और इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा। इसी तरह अगर नरेश मीणा मुस्लिम और एससी, गुर्जर, राजपूत एवं अन्य के वोट लेते हैं तो भाजपा भी मुश्किल में आ सकती है।
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