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भारत भी चीन की राह पर…? घटती जन्म दर ने बढ़ाई नई चिंता, जानें क्या होगा इसका असर

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Indias Fertility Rate Has Dropped Below : नई दिल्ली। भारत में जनसंख्या वृद्धि को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। कभी दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती आबादी वाले देशों में शामिल भारत अब एक नए दौर में प्रवेश करता दिख रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश की जन्म दर यानी फर्टिलिटी रेट अब रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे पहुंच गई है। इस बदलाव ने विशेषज्ञों के साथ-साथ दुनियाभर के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) घटकर 1.9 रह गई है। जबकि किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए रिप्लेसमेंट लेवल फर्टिलिटी रेट 2.1 माना जाता है। इसका मतलब है कि अब औसतन एक महिला उतने बच्चों को जन्म नहीं दे रही है, जितने जनसंख्या को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थिर बनाए रखने के लिए जरूरी होते हैं। यह गिरावट बदलते सामाजिक और आर्थिक रुझानों को दिखाती है। शिक्षा तक बेहतर पहुंच, शहरीकरण, बढ़ती आय और वर्कफोर्स में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी का इसमें बड़ा योगदान माना जा रहा है। सबसे पहले उस रिपोर्ट के बारे में जान लीजिए जिसमें नए आंकड़ों को लेकर इन दिनों खूब चर्चा है।

गिरते प्रजनन दर के पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण

वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में तेजी से शहरीकरण हुआ है। शहरों में बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की ऊंची लागत के कारण लोग छोटे परिवार को प्राथमिकता देने लगे हैं। आज अधिकांश परिवार एक या दो बच्चों तक ही सीमित रहना पसंद कर रहे हैं। इसके अलावा महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ोतरी भी इसका एक बड़ा कारण है। पहले की तुलना में महिलाएं अब उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और करियर को अधिक महत्व दे रही हैं। इसके चलते शादी और मातृत्व की उम्र भी बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक भागीदारी बढ़ती है, जन्म दर में गिरावट आना एक सामान्य प्रक्रिया है। वहीं परिवार नियोजन के साधनों की उपलब्धता और जागरूकता में भी काफी सुधार हुआ है। लोग अब सोच-समझकर परिवार की योजना बना रहे हैं और अनचाहे गर्भधारण के मामलों में कमी आई है।

जन्म दर में कमी के कुछ सकारात्मक पहलू

हालांकि जन्म दर में कमी के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। इससे संसाधनों पर दबाव कम हो सकता है और परिवार बच्चों की बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान दे सकते हैं। लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।

भविष्य में पड़ सकता है कम जन्म दर का सबसे बड़ा असर

कम जन्म दर का सबसे बड़ा असर भविष्य में देश की जनसंख्या संरचना पर पड़ सकता है। आने वाले वर्षों में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जबकि युवाओं की आबादी कम हो सकती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही कामकाजी आबादी घटने से देश की आर्थिक विकास दर पर भी असर पड़ सकता है।

इसी वजह से कई विशेषज्ञ भारत की तुलना चीन से कर रहे हैं। चीन में दशकों तक लागू रही एक-बच्चा नीति के कारण वहां जन्म दर लगातार घटती गई। आज चीन तेजी से बूढ़ी होती आबादी की समस्या का सामना कर रहा है। वहां बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, जबकि युवाओं की आबादी कम होती जा रही है।

क्या चीन जैसी हो जाएगी भारत की स्थिति?

भारत की स्थिति अभी चीन जैसी नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि जन्म दर में लगातार गिरावट जारी रही तो भविष्य में देश को भी इसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है, जिस पर संतुलित और दूरदर्शी नीति की जरूरत होगी।

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