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भारत बस हथियार दे, पाकिस्तान से आज़ादी ले लेंगे, बलूच नेता का दर्दनाक दावा

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– 30 दिन में 151 लापता, पाक सेना पर कत्लेआम का आरोप

बलूचिस्तान, पाकिस्तान का सबसे बड़ा और संसाधनों से भरपूर प्रांत है, लेकिन दशकों से यह क्षेत्र हिंसा, सैन्य दमन और स्वतंत्रता की मांग के चलते विवादों में रहा है। हाल ही में एक बलूच नेता का बयान वैश्विक सुर्खियों में आया जिसमें उन्होंने कहा – “भारत बस हमें हथियार दे दे, बाकी काम हम कर लेंगे। पाकिस्तान से आजादी अब दूर नहीं।”

बलूच नेता के अनुसार, पाकिस्तान की सेना बलूचों का कत्लेआम कर रही है और पिछले 30 दिनों में 151 बलूच नागरिक लापता हो चुके हैं। यह बयान ना केवल पाकिस्तान की छवि पर सवाल उठाता है, बल्कि भारत और बलूचिस्तान के बीच संभावित रणनीतिक समीकरणों की ओर भी इशारा करता है।

बलूच नेता का बयान: क्या कहा उन्होंने?

बलूच नेता, जो यूरोप में निर्वासन में रह रहे हैं, ने एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस से बात करते हुए दावा किया कि – “पाकिस्तान की सेना हमारे लोगों को घरों से उठा रही है, टॉर्चर कर रही है और कई बार उनकी लाशें फेंक दी जाती हैं। अगर भारत हमें हथियारों की मदद दे, तो बलूच लोग खुद ही पाकिस्तान से आजादी हासिल कर सकते हैं। हमें भारतीय सैनिक नहीं चाहिए, बस समर्थन चाहिए।”

उन्होंने कहा कि बलूच लोग आज़ादी के लिए जान दे रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान का सैन्य तंत्र उन्हें हर मोर्चे पर कुचलने में जुटा है।

बलूचिस्तान में मौजूदा हालात

बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तानी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का गढ़ रहा है। यह इलाका प्राकृतिक गैस, खनिज, सोना, तांबा और कोयले से भरपूर है, लेकिन यहां की स्थानीय आबादी को इन संसाधनों से कोई लाभ नहीं मिलता।

बलूच एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि इस क्षेत्र में:

सुरक्षा बल जबरन लोगों को उठा रहे हैं (Forced Disappearances)।

गायब हुए लोगों की लाशें कई बार खुले मैदानों या नदी में फेंकी जाती हैं।

लोकल पत्रकारों को धमकाया जाता है या गायब कर दिया जाता है।

बच्चों और महिलाओं तक को सैन्य कार्रवाई का शिकार बनाया जा रहा है।

बलूच मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, पिछले 30 दिनों में 151 लोग लापता हुए हैं, और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।

भारत की भूमिका: क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय कानून?

बलूच नेताओं का भारत से समर्थन मांगना नई बात नहीं है। 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से दिए गए भाषण में बलूचिस्तान का ज़िक्र कर पाकिस्तान को सीधे संदेश दिया था कि भारत अब चुप नहीं रहेगा। हालांकि, भारत की आधिकारिक नीति ‘नॉन-इंटरफेरेंस’ (गैर-हस्तक्षेप) की रही है, लेकिन बलूच नेताओं का यह कहना कि “भारत सिर्फ हथियार दे दे, सैनिक नहीं भेजे,” एक नए दृष्टिकोण की मांग कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत कोई देश अगर किसी अन्य देश के आतंरिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप करता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जाता है। लेकिन मानवाधिकार हनन और जनसंहार की स्थिति में हस्तक्षेप को ‘मानवीय दायित्व’ (Humanitarian Responsibility) के तहत भी देखा जाता है।

पाकिस्तान का पक्ष और प्रतिक्रिया

पाकिस्तान हमेशा से बलूच स्वतंत्रता संग्राम को “विदेशी फंडिंग से प्रेरित आतंकवाद” बताता रहा है। उसका आरोप है कि भारत, अफगानिस्तान और कुछ पश्चिमी देश बलूचिस्तान में दखल देते हैं।

पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी ISI लगातार बलूच नेताओं को कुचलने की रणनीति अपनाती रही हैं। उनका दावा है कि: बलूच विद्रोही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को निशाना बना रहे हैं। देश की अखंडता को खतरा पैदा करने वालों के खिलाफ “सख्त कार्रवाई ज़रूरी है।” हाल ही में बलूच विद्रोहियों द्वारा किए गए हमलों में पाकिस्तानी सेना के जवान और चीनी कामगार मारे गए हैं, जिससे पाकिस्तान की चिंता और भी बढ़ गई है।

बलूच आजादी की लड़ाई: अतीत से वर्तमान तक

बलूच विद्रोह कोई नया आंदोलन नहीं है। इसकी जड़ें 1948 तक जाती हैं जब पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को जबरन अपने नक्शे में मिलाया। तब से लेकर अब तक कई बार बलूच विद्रोह हुए हैं:

1948 में पहला विद्रोह

1958 और 1963 में सैन्य ऑपरेशन

1973-77 में बड़ा जन आंदोलन

2005 के बाद से वर्तमान संघर्ष का दौर

हर बार पाकिस्तान ने बलूच आंदोलन को सैन्य शक्ति से दबाने की कोशिश की, जिससे हालात और बिगड़ते चले गए। भारत सहित दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए यह समय है कि वे मानवाधिकार के नाम पर बलूचिस्तान के मुद्दे को गंभीरता से उठाएं।

 

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