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इस्लाम में तालीम का महत्व

Jaipur

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तक़रीबन 1450 साल पहले, एक पुर-सुकून और तन्हा घर में, अल्लाह रब्बुल इज्जत अपना नूर भरा पैग़ाम भेजता है — अपने सबसे महबूब और मुक़र्रम बंदे के क़ल्ब-ए-अतहर पर।

यह वही पैग़ाम है जिसकी शुरुआत अल्लाह ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के जरिए इंसानों को दी, फिर तक़रीबन 124000 अंबिया के जरिए से होते हुए, अब अपनी तमाम कामिल शान के साथ आख़री पैग़ंबर पर नाज़िल होता है।

और इस पैग़ाम की इब्तिदा होती है सिर्फ़ एक लफ़्ज़ से: “इकरा” — पढ़ो!

क़ुरआन-ए-मजीद में 500 से 700 अहकाम हैं जिनमें इंसान को इंसानियत के अदाब सिखाए गए हैं, ताकि वो पैदा होने से लेकर मरते दम तक किन उसूलों और अदाब के साथ अपनी ज़िन्दगी बसर करें।

सोचने वाली बात ये है कि क़ुरआन-ए-मजीद ने इतने इंसानी हक़ूक़ बयान किए जैसे:

  • हर शख़्स के साथ इंसाफ़ और इंसानियत का सुलूक करो। (सूरह अन-नहल 16:90)
  • “जिसने एक जान को नाजायज़ मारा, उसने सारी इंसानियत को मारा।” (सूरह अल-माइदा 5:32)
  • वादे की पाबंदी करो, क्यूंकि वादे के बारे में सवाल होगा। (सूरह अल-इसरा 17:34)
  • वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक करो। (सूरह अल-इसरा 17:23)
  • ग़ीबत से बचो। (सूरह अल-हिज़ूरात 49:12)

ये सारे अहकाम हैं जिनके ज़रिये इंसान अपने आप को बेहतर इंसान बनाता है, और ये सब की शुरुआत “इक़रा” से हुई — पढ़ना, सीखना।

इस्लाम में इल्म यानी तालीम को बहुत तर्ज़ीह दी गई है। अरब की वो सरज़मीन जहां ज़ुल्म आम था, और इंसान को जानवर से भी बदतर समझा जाता था, वहां पहला इल्म का मर्कज़ क़ायम हुआ, जो इंसान को इंसानियत सिखाता है।

सभी इंसान बराबर हैं, बेहतरी तक़वा में है, और किसी को दूसरे से कम समझने का हक़ नहीं।

आख़री पैग़ंबर पर क़ुरआन नाज़िल हो रहा था, वो लोगों को इसकी तालीम देते और इंसानियत का पाठ पढ़ाते।

622 ईसवी में जब नबी मदीना हिजरत कर गए, मस्जिद-ए-नबवी में पहला इंसानियत का तालीमी मार्कज़ क़ायम हुआ, जहां वो दिन-रात साहाबा को दीन सिखाते थे।

खलीफ़ा हज़रत अबू बकर रदी अल्लाहु अनहू के ज़माने में क़ुरआन की तदवीन (कॉम्पाइलेशन) का काम हुआ। उसके बाद हज़रत उमर रदी अल्लाहु अनहू के ज़माने में (13 हिज्री / 634 ईसवी) साहाबा को मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में तालीम आम करने के लिए भेजा गया जैसे सीरिया, मिस्र, इराक, यमन, यरुशलम आदि।

हज़रत उमर के ज़माने में तालीम का प्रोपर नि़ज़ाम, हिजरी कैलेंडर की शुरुआत, दफ्तरी यानी ऑफिस रिकॉर्ड जैसे काम, और ज्यूडिशियल सिस्टम जिस में उन्होंने हर शहर में काज़ी को लगाया ताकि वो अदालत और इंसाफ़ कायम रखे, हॉस्पिटल, फ़ौज और आम लोगों के लिए दवाखाने, और दरुल-क़रार मतलब मुसाफ़िरों के लिए रहने का नि़ज़ाम, ये सब किया गया।

उस ज़माने के हिसाब से जितनी सुविधाएं जो एक मुल्क को तरक़्की करने के लिए चाहिए वो सब उन्होंने की, और यही काम आगे साहाबा के दौर में भी हुआ।

और ऐसे ही देखते-देखते शुरू हुआ इस्लामिक गोल्डन एज।

वो इस्लामिक गोल्डन एज जो आज भी दुनिया इस्तिफ़ादा उठा रही है।

इस्लामिक गोल्डन एज का आगाज़ लगभग 8वीं सदी ईसवी (700s के आस-पास) में हुआ, ख़ासकर जब अब्बासी खलीफ़त ने ताक़त संभाली — 750 ईसवी में।

और इस एम्पायर की राजधानी थी सिटी ऑफ़ बग़दाद, जिसे कहा जाता था ‘द सिटी ऑफ़ पीस’।

अब्बासी सुल्तान बद्शाह अल-मंसूर का सपना था कि दुनिया के सारे इल्म को एक जगह इकट्ठा किया जाए।

उनका यह सपना हरून अल-रशीद और अल-मामून ने नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

और देखते ही देखते बग़दाद दुनिया का नॉलेज कैपिटल बन गया।

इस सब के बीच था बग़दाद का हाउस ऑफ़ विजडम यानी बैतुल हिक़्मह, जिसे आप आज का NASA, Harvard, Oxford भी मान सकते हैं।

वो सिर्फ एक इमारत नहीं थी, वो इल्म का गढ़ था जिसमें बहुत बड़ी लाइब्रेरी थी।

उस वक्त उसमें 5 लाख से ज़्यादा किताबें थीं, जबकि पूरे यूरोप में 100 से कम किताबें थीं।

और उस में एक अकादमी थी जिसमें मैथ, जियोग्राफी, फिलॉसफी, मेडिसिन पढ़ाई जाती थी।

यहाँ चीन से लेकर स्पेन तक के लोग नॉलेज शेयर करने आते थे।

और यह पहला ऐसा मार्कज़ बना जिसमें हिंदू, मुस्लिम, यहूदी, चीनी, क्रिश्चियन सब एक जगह मिलकर इल्म जमा करते थे।

और वो स्कॉलर बग़दाद के स्कॉलर्स को उनके वज़न के बराबर सोना दिया जाता था ताकि वे इस इल्म की तिजोरी को खोल सकें।

यही था हाउस ऑफ़ विजडम जहां से बड़े-बड़े साइंटिस्ट पैदा हुए जिन्होंने ऐसी-ऐसी डिस्कवरीज़ की जो आज तक पूरी दुनिया इस्तेमाल कर रही है।

चलिए अब जानते हैं वो कौन-कौन सी डिस्कवरीज़ थीं:

इब्ने सीना (Abu Ali Al-Hussein Ibn Abdullah Ibn Sina):

980 इस्वी में सेंट्रल एशिया के शहर बुख़ारा के करीब गांव अफशाना में पैदा हुए।

उन्होंने 10 साल की उम्र में क़ुरआन-ए-मजीद को अपने दिल में महफूज़ किया।

और उसके बाद उन्होंने इस्माइल अल-जाहिद से फ़िक़्ह का इल्म भी हासिल किया।

18 साल की उम्र में एक क्वालिफाइड फ़िज़ीशियन बन गए।

और उन्होंने 1025 में ‘अल-कानून फी अल-तिब्ब’ किताब लिखी।

इब्ने सीना ने अपनी ज़िंदगी में 240 किताबें लिखीं जिनमें से दो किताबें ऐसी थीं जिन्हें अल्लाह ने ऐसी कामयाबी दी कि वे बुनियाद बनीं आज की मॉडर्न मेडिकल साइंस की:

  1. अल-कानून फी अल-तिब्ब (The Canon of Medicine)
  2. किताब अल-शिफ़ा (The Book of Healing)

जो कि यूरोप और मिडिल ईस्ट में 700 साल तक मेडिकल टेक्स्टबुक रही (17वीं सदी तक)।

और इनके बारे में आता है कि ये कई मरीज़ों का इलाज फ्री में भी किया करते थे।

इनकी वफ़ात 1037 में ईरान के हमदान में हुई।

अल-ज़हरावी (Abū al-Qāsim al-Zahrāwī):

इनका पूरा नाम है अबू अल-कासिम अल-जहरावी।

इनकी पैदाइश कॉर्डोबा (स्पेन) में 934 इस्वी में हुई।

उन्होंने उस वक़्त के मशहूर आलिम से क़ुरआन और हदीस का इल्म हासिल किया।

सबसे पहले उन्होंने ‘The Method of Medicine’ ये उनकी पहली किताब थी जो उन्होंने अपने करियर में लिखी।

उनकी मशहूर किताब ‘अत-तसरीफ़’ है जिसे लोग आज भी फायदा उठा रहे हैं।

और वो कई फ़न के माहिर थे जैसे सर्जरी में महारत।

इसलिए इन्हें ‘फादर ऑफ़ सर्जरी’ भी कहा जाता है।

इसी तरह के कई नाम हैं: अल-ख्वारिज़्मी, इब्ने सीना, अल-राज़ी, अल-बिरुनी, अल-किंदी।

अगर आप इनके बारे में डिटेल में पढ़ना चाहते हैं तो आप ‘इस्लामिक गोल्डन एज’ पढ़ सकते हैं।

इन सब में एक बात नोटिस करें: मैंने जितने भी आपको साइंटिस्ट बताए वो सब दुनिया के साथ-साथ दीन का इल्म भी रखते थे।

जो लोग कहते हैं ना कि एक मदरसे का पढ़ा हुआ डॉक्टर नहीं बन सकता, तो इन्हें देखिए — ये आलिम, हफ़िज़ के साथ-साथ साइंटिस्ट भी थे।

यह सारी बातें जान कर मुझे वह क़ुरआन की आयत याद आ गई:

“अल्लाह ताला नेक लोगों का अज्र ज़ाया नहीं करता।” (9:120)

अल्लाह ताला इनका अज्र भी ज़ाया नहीं करेगा।

असल ये सारी बातें का मेरा मकसद यह था कि हम अपने आप को पहचानें।

यह सब 1200 साल पहले पैदा हुए, इनके पास भी वही क़ुरआन था जो आज हमारे पास है।

इन लोगों ने भी वही कलमा पढ़ा जो हमने पढ़ा है। फिर क्या चीज़ जिसकी वजह से हम आज पीछे हैं?

असल वह है दीन के इल्म की कमी और बेफ़िक्री।

हम समझते हैं कि पढ़-लिख कर क्या होगा?

आइए मैं आपको बताता हूँ क्या होगा:

जब इंसान मर जाता है तो उसके सारे अमल का सिलसिला कट जाता है सिवाय तीन चीज़ों के:

  1. सदक़ा जारीया
  2. इल्म जिससे लोग फ़ायदा उठाएं
  3. नेक औलाद जो उसके लिए दुआ करें (सही मुस्लिम 1631)

अब मुझे बताइए, इन लोगों ने जो इल्म का काम किया आज दुनिया उनसे फ़ायदा उठा रही है, क्या उनकी कब्र में सवाब नहीं पहुँच रहा होगा?

और आज 1200 साल हो गए। हम जैसे लोग मजबूर हैं उनका ज़िक्र करने पर और आप सुनने पर।

सबसे पहले अपना नज़रिया दुरुस्त कीजिए।

दूसरा अपनी दिलचस्पी देखिए।

आपको डॉक्टर बनना है, बनिए।

इंजीनियर बनना है, बनिए।

काम को सिर्फ जॉब के नज़रिए से नहीं, कुछ करने की नीयत से अपना विज़न बनाइए।

इन सब ने अपना विज़न बनाया था इसलिए आज यह मुकाम हासिल किया।

(मुहम्मद सोहैल)

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