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हुक़ूक़ुल्लाह और हुक़ूक़ुल इबाद

Jaipur

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पैगंबर मुहम्मद ने फ़रमाया है कि “जहल का इलाज सवाल है।” अहद-ए-रिसालत में एक शख़्स को जो बीमार था, ग़ुस्ल की हाजत हुई। लोगों ने उसे ग़ुस्ल करा दिया, वो बेचारा सर्दी से ठिठुर कर मर गया। जब ये ख़बर पैगंबर मुहम्मद को पहुँची तो आप बहुत नाराज़ हुए और फ़रमाया: “उसे मार डाला, ख़ुदा उसे मारे, क्या जहल का इलाज सवाल न था।”

हज़रत उम्मे सुलैम ने पैगंबर मुहम्मद से अर्ज़ किया: “ख़ुदा हक़ बात से नहीं शर्माता, क्या औरत पर भी ग़ुस्ल है (एहतिलाम की हालत में)?” हज़रत आयशा फ़रमाया करती थीं: “ख़ुदा की रहमत हो अंसारी औरतों पर, शर्म उन्हें अपना दीन सीखने से बाज़ न रखेगी।” हज़रत अस्मी से पूछा गया: आपने ये तमाम उलूम कैसे हासिल किये? तो फ़रमाया: “मुसलसल सवाल से और एक-एक लफ़्ज़ गिरह में बाँध कर।” हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ फ़रमाया करते थे: “बहुत कुछ इल्म मुझे हासिल है लेकिन जिन बातों के सवाल से मैं शर्माया था, उनसे इस बुढ़ापे में भी जाहिल हूँ।” इब्राहीम बिन मेहदी का क़ौल है: “बेवक़ूफ़ों की तरह सवाल करो और अक़्लमंदों की तरह याद करो।” 2मशहूर मक़ूला है: “जो सवाल करने में सुबकी और आर महसूस करता है, उसका इल्म भी हल्का होता है।” (अल-इल्म वल-उलमा, अल्लामा इब्नुल बर्र अंदलुसी)

इस तम्हीद के बाद मुझे चंद सवालात करने हैं:

स: “इज़ा जा-अ हक़्क़ुल्लाह ज़-ह-ब हक़्क़ुल अब्द” और दूसरा क़ौल बिल्कुल इसके बरअक्स है: “हक़्क़ुल अब्द मुक़द्दम अला हक़्क़िल्लाह”। कौन सा क़ौल मुस्तनद है? और क्या ये अक़वाल हदीस हैं?

ज: ये अहादीस नहीं, बुज़ुर्गों के अक़वाल हैं और दोनों अपनी जगह सही हैं। पहले क़ौल का मतलब ये है कि जब हक़्क़ुल्लाह की अदायगी का वक़्त आ जाए तो बन्दों के हुक़ूक़ ख़त्म। और ये ऐसा ही है जैसा हज़रत आयशा फ़रमाती हैं कि पैगंबर मुहम्मद हमारे साथ मशग़ूल होते थे और जब नमाज़ का वक़्त आ जाता तो ‘क़ा-म-क-अन्नहु लम य’अरिफ़ना’ (इस तरह उठकर चले जाते गोया हमें जानते ही नहीं)।

दूसरे क़ौल का मतलब ये है कि हुक़ूक़ुल इबाद और हुक़ूक़ुल्लाह जमा हो जाएं तो हुक़ूक़ुल इबाद का अदा करना मुक़द्दम है।

 

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