हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया: आखिर क्यों कहलाए “मेहबूब-ए-इलाही”?
एक रूहानी दास्तां
पीरो मुर्शीद का वो सवाल
दिल्ली/जयपुर। सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (र.अ.) को दुनिया “मेहबूब-ए-इलाही” के नाम से जानती है, लेकिन यह लकब उन्हें कैसे मिला, इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और रूहानी वाकया है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने पीरो मुर्शीद (गुरु) हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर (र.अ.) की खिदमत में हर वक्त रहा करते थे।
जब बाबा फरीद ने हज़रत निज़ामुद्दीन को इश्क-ए-हक़ीक़ी, इल्म-ए-मारिफ़त और ओसाफ-ए-इलाहिया से पूरी तरह वाकिफ करा दिया और मुरीदे कामिल बना दिया, तो उन्होंने एक दिन सवाल किया: “निज़ामुद्दीन, तुम ‘मुहिब’ (चाहने वाला) बनना चाहते हो या ‘मेहबूब’ (जिससे चाहा जाए) बनना चाहते हो?”
रास्ते में मिला रहस्यमयी मज़जूब
हज़रत निज़ामुद्दीन इस गहरे सवाल पर खामोश रहे और फिर अदब से कहा कि वे अपनी वालिदा (माँ) से मशवरा करने के बाद ही जवाब देंगे। पीरो मुर्शीद से इज़ाज़त लेकर वे अपनी वालिदा से मिलने रवाना हुए।
रास्ते में उनकी नज़र एक ‘मज़जूब’ (ईश्वरीय प्रेम में लीन फकीर) पर पड़ी। वह फटे-पुराने कपड़ों और बिखरे बालों में रास्ते के किनारे बैठे थे। हज़रत निज़ामुद्दीन ने उन्हें सलाम किया। सलाम का जवाब देने के तुरंत बाद मज़जूब ने पूछा, “मुहिब बनोगे या मेहबूब, क्या बनना चाहते हो?” हज़रत निज़ामुद्दीन सकते में आ गए कि जो बात उनके पीर ने तन्हाई में कही थी, वह इस राहगीर को कैसे मालूम हो गई।
वालिदा की सलाह और वापसी
जब हज़रत निज़ामुद्दीन अपनी वालिदा के पास पहुंचे और उन्हें पूरी बात बताई, साथ ही उस मज़जूब के बारे में भी ज़िक्र किया। वालिदा ने काफी सोचने के बाद कहा, “बेटा, तुम वापस जाओ और जो वो मज़जूब कहें, वही बनना कबूल कर लेना।”
वालिदा की दुआएं लेकर जब वे वापस उसी जगह पहुंचे, तो देखा कि वह मज़जूब वहां नहीं थे। आस-पास के लोगों से पूछने पर पता चला कि उनका इंतकाल हो गया है और लोगों ने उनकी लाश को पास ही कूड़े के ढेर पर फेंक दिया है।
कूड़े के ढेर से आई आवाज़: मुहिब और मेहबूब का फर्क
हज़रत निज़ामुद्दीन दौड़कर उस कूड़े के ढेर के पास पहुंचे और शिकायती लहजे में कहा, “हज़रत, मेरी वालिदा ने आपकी सलाह मानने को कहा था, लेकिन आपने तो मेरी वापसी का इंतज़ार भी नहीं किया। अब मैं क्या बनूँ?”
रिवायत है कि तभी वहां से एक आवाज़ आई: “मुहिब मत बनना। अगर मुहिब बनोगे तो देख लो मेरा जैसा हाल होगा। फ़ौत होने पर कफ़न और गौर (कब्र) भी नसीब नहीं होगा। इसलिए ‘मेहबूब’ बनना पसंद करना। अगर मेहबूब बनोगे तो:
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लोग तुम्हारी इज़्ज़त और कद्र करेंगे।
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तुम्हें शोहरत मिलेगी और लोग जोक-दर-जोक तुम्हारे पास आएंगे।
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ज़िंदगी में हाजतमंदों का तांता लगा रहेगा और इंतकाल के बाद भी तुम्हारे मज़ार पर मेले लगा करेंगे।”
मेहबूब-ए-इलाही का लकब
इस वाकये के बाद आप अपने पीर बाबा फरीद के पास गए और कहा कि “मैं मेहबूब बनना पसंद करूंगा।” इस तरह आप “मेहबूब-ए-इलाही” (अल्लाह के प्यारे) कहलाए।
आज दिल्ली की बस्ती निज़ामुद्दीन इस बात की गवाह है। जहाँ आपका मज़ार-ए-अक़दस है, वहां हर वक़्त मेले जैसा समाँ रहता है और हर धर्म के लोगों की भीड़ उमड़ती है। यह उसी फैसले और अल्लाह के मेहबूब होने की करामात है।
प्रस्तुति: हबीबुल्लाह एडवोकेट जवाहर नगर, जयपुर
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