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शहर में ताज़िए,जूलूस निकालकर हजरत इमाम हुसैन की शहादत को किया याद

सवाई माधोपुर

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(शादाब अली)

सवाई माधोपुर, (रॉयल पत्रिका)। जिला मुख्यालय पर पुराने शहर में रविवार को मोहर्रम का पर्व गम और अकीदत के साथ मनाया गया। यह अवसर हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में दी गई शहादत को याद करने का दिन रहा। कर्बला का यह वाक्य इंसानियत, न्याय और सत्य के लिए बलिदान की मिसाल है, जिसे दुनियाभर में कर्बला की शहादत के रूप में याद किया जाता है। कार्यक्रम में मोहर्रम कमेटी के सदर अंसार अहमद, मुख्य अतिथि के रूप में भाजपा नेत्री मेहनाज पटेल ने शिरकत की। अखाड़ा कमेटी सदर असरारुद्दीन पिंटू,असरार अहमद,कोतवाली थाना इंचार्ज हरलाल,शहर पुलिस चौकी इंचार्ज हरिलाल,सीटी बस अध्यक्ष अतीक अहमद,शाहरुख पार्षद,प्रदेश सचिव कांग्रेस सलमान रंगरेज, कलीम अहमद,सदस्य कदीर अंसारी, कलाम अंसारी और अन्य पदाधिकारियों का पारंपरिक साफा बांधकर व माला पहनाकर स्वागत किया गया। इस अवसर पर परंपरागत रूप से ताजिए का भव्य जुलूस निकाला गया, जिसमें भारी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए। जुलूस की शुरुआत शहर पुलिस चौकी से हुई, जो मुख्य बाजार, सिनेमा चौराहा, छीतर चौराहा से खंडार तिराहा होते हुए कर्बला मैदान तक पहुँचा। जुलूस के दौरान हजरत इमाम हुसैन के चाहने वालों ने “या हुसैन” की सदाओं के बीच मातम किया और हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद कर लोगों की आँखें नम कर दी। इस अवसर पर मिर्जा मोहल्ला, हम्माल मौहल्ला, बिसायती मौहल्ला, खरादी मौहल्ला, अंसारी मौहल्ला, गुजराती मौहल्ला, ठठेरा कुण्ड आदि मौहल्ले के लोगों द्वारा पारंपरिक अखाड़े का आयोजन कर नौजवानों ने लाठी, तलवार और शारीरिक करतबों से अपने बहादुरी और जज़्बे का सबूत दिया। कुछ अकीदतमंदों ने अपने शरीर पर लाख लगवाकर अकीदत और इमाम से मोहब्बत का इज़हार किया, जो इश्क़-ए-हुसैनी की इंतिहा को दर्शाता है। इस अवसर पर नौजवान युवाओं और बुजुर्गो ने शारीरिक कौशल और साहस का प्रदर्शन कर हेतरत अंगेज करतब दिखाये। इसके अतिरिक्त युवाओं द्वारा अलग-अलग धुन पर ढोल बजाये जिसने लोगों को देर रात तक रूकने के लिए मजबूर कर दिया।

इस अवसर पर इमाम हुसैन के चाहने वालों ने विभिन्न स्थानों पर छबील लगाकर लोगों को शरबत पिलाया। वहीं अंसारी मौहल्ला, मिर्जा मौहल्ला, गुजराती मौहल्ला, नीम चौकी, बिसायती खरादी आदि मौहल्लों हलीम बनाकर लोगों की दावत भी की गई।मोहर्रम कमेटी के सदर अंसार अहमद ने कहा कि मोहर्रम का जुलूस महज एक रस्म नहीं, बल्कि यह ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद करने और हक की राह में जान क़ुर्बान करने का संदेश देता है, जैसा कि हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में किया। इमाम हुसैन पैगम्बर हजरत मुहम्मद (स.अ.व.) के नवासे और हजरत अली व हज़रत फ़ातिमा जहरा के छोटे बेटे थे। उनकी जिंदगी सत्य, न्याय और बलिदान का प्रतीक है।

करबला का सफर:- जब यज़ीद की सेना ने मदीना में उनके लिए खतरा बढ़ाया, तो इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मक्का चले गए। वहाँ से वे कूफ़ा (इराक) के आमंत्रण पर निकले, जहाँ के लोग उनका समर्थन करने का वादा कर चुके थे। लेकिन रास्ते में ही हालात बदल गए। कूफ़ा के लोग यज़ीद के डर से पीछे हट गए और इमाम हुसैन के काफिले को करबला के तपते रेगिस्तान में रोक दिया गया। जिसमें बच्चे, महिलाएं और बुज़ुर्ग सहित 72 साथी शामिल थे। जबकि यजीद की फौज में 30 हजार सिपाही थे जिन्होंने इमाम हुसैन के काफिले को पानी तक पहुँचने से भी रोक दिया और इमाम हुसैन व उनके सभी साथियों को बारी-बारी से शहीद कर दिया। इस दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा सम्पूर्ण जूलूस के दौरान सुरक्षा के पुख़्ता इंतजाम किए। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई थी, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ।

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