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हलाल लुक़्मा, पाक नीयत

जयपुर

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जब कोई “इबादत” का ज़िक्र करता है, तो ज़ेहन में क्या आता है? अक्सर लोग इसे एक तयशुदा तरीके से, किसी ख़ास जगह पर अदा की जाने वाली कोई मजहबी रस्म समझते हैं।मगर इस्लाम में, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में किया गया हर अमल अगर अल्लाह के बताए तरीक़े और नीयत के साथ किया जाए तो वो भी इबादत बन जाता है। खाना, जो बुनियादी जिस्मानी ज़रूरत है भी अल्लाह और हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) की हिदायतों के मुताबिक नीयत के साथ खाया जाए तो ये भी इबादत बन जाता है। खाना इंसान की ज़िंदगी में बेहद अहम रोल अदा करता है। इसमें शक नहीं कि इंसान के ज़िंदा रहने के लिए खाना एक बुनियादी ज़रूरत है। इस्लाम इंसान के जिस्म और दिमाग़ की तंदरुस्ती के लिए खाना खाने की अहमियत को तस्लीम करता है। जिस्म सही होगा तो दिमाग़ भी सेहतमंद रहेगा।

क़ुरआन में खाने का जिक्र

क़ुरआन और हदीस में गिज़ा से भरपूर हलाल और पाक चीज़ों को खाने की हिदायत दी गई है।
ऐ लोगो! ज़मीन में जो कुछ हलाल और पाक चीज़ें हैं, उन्हें खाओ। (सूरह अल-बक़रा 2:168)

तो जो जानवर उस पर अल्लाह का नाम लिया गया हो, उसमें से खाओ, अगर तुम उस पर ईमान रखते हो। (सूरह अल-अनआम 6:118)

समंदर का शिकार और उसका खाना तुम्हारे लिए हलाल कर दिया गया। (सूरह अल-माइदा 5:96)

हम तुम्हें एक पाक दूध पिलाते हैं, जो पीने वालों को आसानी से गले से उतर जाता है। (सूरह अन-नहल 16:66)

“(अल्लाह) वही है जिसने बाग-बगीचे पैदा किए कुछ झुके हुए और कुछ सीधे, खजूरें, फसलें, जैतून, अनार जो आपस में मिलते-जुलते भी हैं और अलग भी, इन सबके फल जब पकें तो उनसे खाओ। (सूरह अन-नहल 16:141)

ज़िंदगी खाने के लिए या खाना ज़िंदगी के लिए?

इस्लाम खाने में एतेदाल (मॉडरेशन) पर ज़ोर देता है। मुसलमानों को खाने का मक़सद सिर्फ़ पेट भरना नहीं बल्कि तंदरुस्ती बनाए रखना बताया गया है। बेहतरीन ज़िंदगी जीने के लिए संतुलित खाना ज़रूरी है। आज की रिसर्च भी बताती है कि ज़्यादा खाना, गलत खानपान मोटापा, हाई कोलेस्ट्रॉल, दिल की बीमारियां और डायबिटीज़ जैसी बीमारियों को बढ़ाता है।

इस्लाम की हिदायतों में भी यही है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। इसलिए हद से ज़्यादा खाना मना किया गया है।

खाओ, पियो, मगर हद से न बढ़ो। यक़ीनन अल्लाह हद से बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता। (सूरह अल-अआराफ़ 7:31)

हमने जो पाक चीज़ें तुम्हें दी हैं, उनमें से खाओ, मगर उसमें हद से न बढ़ो। (सूरह ताहा 20:81)

हदीसों में भी इसी पर ज़ोर है। हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने फ़रमाया:

इंसान ने अपने पेट से ज़्यादा बुरा कोई बर्तन नहीं भरा। कुछ निवाले जो उसकी पीठ सीधी रखें, काफी हैं। और अगर ज़रूर खाना हो तो पेट का एक-तिहाई खाना, एक-तिहाई पानी और एक-तिहाई सांस के लिए छोड़ दे। (मुसनद अहमद)

कुछ लोगों को लग सकता है कि इस्लाम बहुत छोटी-छोटी बातों पर ज़्यादा ध्यान देता है, जैसे खाना-पीना। जबकि ज़कात, मोहब्बत, रहमत जैसी बड़ी बातें ज़्यादा अहम हैं। लेकिन इस्लामी नज़रिया-ए-ज़िंदगी यही है कि इंसान और उसके ख़ालिक़ यानी अल्लाह के बीच रिश्ता मज़बूत हो, और इसके लिए ज़िंदगी का हर हिस्सा तंदरुस्त और संतुलित होना ज़रूरी है।

 

शिफा वाले खाने

क़ुरआन और हदीस में कई खाद्य पदार्थों को उनके शिफा देने वाले गुणों की वजह से सिफ़ारिश की गई है, जैसे शहद, खजूर, अंजीर, दूध और जैतून।

शहद के बारे में क़ुरआन में है:

और तुम्हारे रब ने मधुमक्खी को वह्यी (प्रेरणा) दी: पहाड़ों, दरख़्तों और बनाए गए छप्परों में घर बना। फिर हर तरह के फल खा और अपने रब के रास्तों पर चल। उनके पेटों से एक शरबत निकलता है, अलग-अलग रंगों का, जिसमें लोगों के लिए शिफा (इलाज) है।यक़ीनन इसमें सोचने वालों के लिए निशानी है। (सूरह अन-नहल 16:68-69)

खजूर के बारे में हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) ने फ़रमाया:

दरख़्तों में एक दरख़्त ऐसा है जो मुसलमान की तरह है वह खजूर का पेड़ है। (बुखारी)

जैतून के बारे में क़ुरआन में कई बार ज़िक्र हुआ:

“(अल्लाह) वही है जिसने बाग़ात पैदा किए, खजूर, खेती, ज़ायकेदार फल, जैतून और अनार इनमें से कुछ मिलते-जुलते हैं और कुछ अलग। जब ये फल दें तो उनसे खाओ और उनकी फसल के दिन उसका हक़ अदा करो और फ़िज़ूलखर्ची मत करो। यक़ीनन अल्लाह फ़िज़ूलखर्चों को पसंद नहीं करता। (सूरह अन-आम 6:141)

हराम (मना किए गए) खाने

इस्लाम में तमाम खाद्य पदार्थ हलाल हैं सिवाय उन चीज़ों के जो नुकसानदायक हों। क़ुरआन में खाने-पीने की हिदायतें दी गई हैं:

तुम पर हराम कर दी गई हैं मरी हुई चीज़, खून, सूअर का गोश्त और वो जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो। लेकिन अगर मजबूरी में खाना पड़े, ना खुद से ना हद से बढ़ कर, तो कोई गुनाह नहीं। यक़ीनन अल्लाह बहुत माफ़ करने वाला, रहमत वाला है। (सूरह अल-बक़रा 2:173)

तुम पर हराम किया गया है: मरी हुई चीज़, खून, सूअर का गोश्त, वो जानवर जिस पर अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया गया हो, जो गला घोंट कर मारा गया हो, जो ज़ख़्म लगने से मरा हो, जो ऊँचाई से गिर कर मरा हो, जिसे जानवर ने मारा हो सिवाय इसके कि तुम उसे ज़बह कर लो जो किसी मूर्ति पर चढ़ाया गया हो, और किस्मत के तीरों से गोश्त बाँटना। ये सब गुनाह हैं। (सूरह अल-माइदा 5:3)

शराब के बारे में क़ुरआन में है:

“(ऐ नबी!) लोग तुमसे शराब और जुए के बारे में पूछते हैं। कह दो कि उनमें बड़ा गुनाह है और कुछ फायदा भी है, मगर गुनाह उनका फायदा से ज़्यादा है। (सूरह अल-बक़रा 2:219)

खाने-पीने के आदाब (शिष्टाचार)

इस्लाम खाने और पीने के तौर-तरीक़ों पर भी ज़ोर देता है। इनमें से कुछ हैं:

  • खाने से पहले और बाद में हाथ धोना।
  • खाना शुरू करने से पहले “बिस्मिल्लाह” कहना।
  • सिर्फ़ भूख लगने पर खाना।
  • ज़रूरत से ज़्यादा न खाना, न पीना।
  • बैठकर पानी पीना।
  • हर बार खाने और पीने पर अल्लाह का शुक्र अदा करना।

इस्लाम के मुताबिक खाना सिर्फ़ जिस्म की ज़रूरत नहीं, बल्कि अल्लाह की नेमतों का एहसास करने और उस पर शुक्र अदा करने का एक जरिया है। जब इंसान खाने को भी अल्लाह की दी हुई नेमत मानकर, उसके बताए हुए तरीके से खाता है, तो वही आम अमल भी इबादत बन जाता है।

 

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