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हज की तैयारी पूरी, अराफात 5 जून को, तवाफ़-ए-विदा 10 जून को

जयपुर

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मक्का। इस वर्ष हज 4 जून 2025 से शुरू होगा, अराफात दिवस 5 जून को है और ईद उल-अज़हा 6 जून को होगी। इसी के मद्देनज़र वहाँ खादिम उल हुज्जाज के कोटे से हज के सफर पर गये रकमा प्रदेश अध्यक्ष अतीक अहमद ने हज यात्रियों को हर दिन क्या करना है, इसकी टाइमलाइन बताई है। हज की परंपरा के मुताबिक हाजी 1–2 जून तक मक्का पहुँचकर तैयारियाँ पूरा कर लेंगे, फिर 3 जून से मुख्य हज यात्रा शुरु होगी। विदेशी हाजियों के लिए 31 मई (4 धुल हिज्जा) तक सऊदी अरब पहुंचना लाज़मी होता है, इसलिए 1 जून को ज्यादातर हाजी मक्का पहुंचकर होटल में चेक-इन कर लेंगे और आराम करेंगे। इस दिन काबा शरीफ़ में उमरा (तवाफ़-ए-उमरा) के अरकान पूरे किए जा सकते हैं और मस्जिद अल-हरम में नफ़्ल इबादत की जाएगी। साथ ही एहराम पहनने की तैयारियाँ की जाएंगी।

वही 2 जून को हाजी काबा शरीफ़ में नफ़्ल नमाज़ अदा करें, ज़ियारत की जगहें देखें और उमराह पूरी करें (अगर 1 जून पर नहीं हुआ हो)। मस्जिद अल-हरम में धूप, अराफात की तैयारी और क़ाफ़िले की तन्‍ज़ीम के काम होंगे। अतीक अहमद के मुताबिक 3 जून की शाम (7 धुल हिज्जा) मग़रिब या इशा के बाद हाजी मीना के लिए रवाना होंगे। हदीस के मुताबिक इस दिन रात के करीब मीना पहुंचना चाहिए, ताकि अगले दिन के लिए तैयारियाँ शुरू हो सकें। यह दिन ‘तर्वीयाह दिवस’ (8 धुल हिज्जा) कहलाता है। हाजी दिन भर मीना में ही रहकर इबादत और नमाज़–ओ–दुआ में मसरूफ़ रहते हैं। ईशा के बाद नई रात में हाजियों को अराफात के लिए रवानगी कर देना चाहिए, ताकि सुबह तक अराफात पहुँचा जा सके।

अराफात का दिन: 5 जून (9 धुल हिज्जा) अराफात दिन है, जिसे हज का बुलंद मकाम माना जाता है। इस दिन हाजियों को सूरज निकलने से पहले अराफात मैदान (माउंट ऑफ मरसी) में खड़े होकर नमाज़, दुआ और इबादत करनी है। सूरज ढलने के बाद ही हाजियों को मुज़दल्फ़ा के लिए रवानगी करनी होगी। मुज़दल्फ़ा पहुंचने पर मगरिब और ईशा की नमाज़ एक साथ अदा करें और अगले दिन के जमरात के लिए कंकरियाँ जमा करें।

ईद उल-अज़हा व जमरात: 6 जून (10 धुल हिज्जा) ईद उल-अज़हा का पहला दिन है और हज का दूसरा जरूरी दिन है। दिन चढ़ते ही हाजियों को मुज़दल्फ़ा से मीना लौटना है। मीना पहुँचकर सबसे पहले बड़े शैतान (जम्मारत-ए-अकबर) पर सात कंकरियां फेंकें। इसके बाद कुर्बानी अदा करें और सिर मुंडवाएँ (हल्क/तस्लीख), यानि एहराम से बाहर आएँ। इसी दिन या उसके बाद हाजियों को मक्का जाकर तवाफ़-ए-इफ़ादा (तवाफ़ ए ज़ियारत) भी करना है।

शैतान पर कंकरी फेंकना: 7 जून (11 धुल हिज्जा) को मीना में हाजियों को तीनों जमरात (शैतान) पर सात- सात पत्थर फेंकने हैं। यह पहला यौम-ए-तशरीक (12,13,14 धुल हिज्जा) का दिन है। 8 जून (12 धुल हिज्जा) को भी हाजियों को तीनों जमरात पर सात- सात पत्थर फेंकने हैं। इस दिन ज़ूहर की नमाज़ तक मीना में रुकने के बाद सूरज डूबने से पहले मक्का रवानगी लेनी है।

वतन वापसी से पहले हाजी मक्का लौटकर तवाफ़ ए विदा करेंगे और फिर अपने मुल्क वापसी करेंगे। 14 धुल हिज्जा (10 जून, 2025) को हाजी अपने घर लौटने के लिए रवाना होंगे। परंपरा के अनुसार इस अलविदा दौर में हर हाजी को काबा शरीफ़ का अंतिम चक्कर लगाना होता है।

 

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