हाफिज़ मोहम्मद ज़ामिन शहीद,1857 की क्रांति के गुमनाम नायक
हाफिज़ मोहम्मद ज़ामिन 1857 के विद्रोह में शहीद होने वालों में से एक हैं। उनका जन्म 1809 ई. में मुज़फ्फरनगर में हुआ था। उन्होंने इस्लामिक रीति रिवाज़ो से शिक्षा हासिल कर कुरान के हाफिज़ बन गये। उस ज़माने में लोगों को रूहानियत, इल्मे तसव्वुफ का शौक होने की वजह से आपने “मियां जी नूर मोहम्मद झाझनवी” से बेअत स्वीकार कर ली। दौर था 1857 का, जब धीरे धीरे फिरंगियों के खिलाफ अलग अलग क्षेत्रों और रियासतों में बगावत की चिंगारियां सुलग रही थी, इसी दरमियान थाना भवन के स्थानीय निवासियों द्वारा हाजी इमदाद उल्ला मुहाजिर मक्की को अपना नेता घोषित कर दिया जाता है। मौलाना रशीद अहमद गगोंही, मौलाना कासिम नानौतवी, हाफिज़ मोहम्मद ज़ामिन समेत थाना भवन और शामली की जनता ने हाजी इमदाद उल्ला के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ शामली में बिगुल बजा डाला। शामली तहसील में ब्रिटिश हुकूमत का खज़ाना और यहीं तोपखाना, अस्लहा मौजूद था। 14 सितंबर 1857 का दिन था — क्रान्तिकारी समूह द्वारा तहसील पर धावा बोल कर, उसे तहस नहस कर डाला और अंग्रेज़ फौज की ईंट से ईंट बजा डाली। अंग्रेज़ फौज और विद्रोहियों में कई घंटों तक सख्त लड़ाई हुई और इसी दौरान गोलीबारी में हाफिज़ मोहम्मद ज़ामिन के पेट में गोली लग जाती हैं और वे लहुलुहान होकर देश के लिए शहीद हो जातें हैं। सलाम इन वीर सपूतों को जिन्होंने देश के खातिर अपने प्राणों का बलिदान देकर हमें स्वतंत्रत भारत में स्वतंत्र सांस लेने का सौभाग्य दिया ।
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