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ख्यालों की तपिश

Jaipur

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ख्यालों की तपिश

हवस  इतनी  सी  के चूम  लूं  सुलगती हुई  आंखें

तुम्हारे साथ पल इतना भी मिल जाए तो अच्छा है

मेरे  अरमान  के  टुकड़े  अभी   रक्खे  हैं  सीने  में

तुम्हारे प्यार की सुंई से ये  सिल जाए  तो अच्छा है

खयालों  की तपिश  से  हमको  कितना  तपाओगे

के फीकी  चाय में आकर तू घुल जाए तो अच्छा है

बड़ा ज़िद्दी मगर  एहसान भी करता  है जो सबपर

तुझे  पाने की  ज़िद में  वो मचल जाए तो अच्छा है

सुनो  खामोशियां  अच्छी  नहीं  होती  मोहब्बत में

बुरे अंजाम  से पहले    संभल  जाए  तो  अच्छा  है

मेरे  मुर्शिद  ने चुपके  से जो  समझा  दिया मुझको

मोहब्बत की जुबां में अब तू ढल जाए तो अच्छा है

मेरी  पाकीज़गी   तो  देख  शोहरत  में   बसती  है

तेरी बदनामियां  तुझसे  बिछड़  जाए तो अच्छा है

मेरी  बर्दाश्त की  हद  समंदर  से  भी  बढ़  कर  है

नदी-नालों की फितरत भी बदल जाए तो अच्छा है

 

तख़लीक़ :- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव (सेवा निवृत्त)

 

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