गणगौरी बाजार में 108 करोड़ की लागत से बन रहे 300 बेड के निर्माण कार्य रुका
जावेद अख्तर
गणगौरी बाजार में 108 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे 300 बेड के सुपर स्पेशियलिटी मिनी एसएमएस अस्पताल की हकीकत जानने के लिए रॉयल पत्रिका की टीम मौके पर पहुंची। टीम ने पाया कि भवन का ढांचा लगभग तैयार है, लेकिन फिनिशिंग, उपकरण स्थापना और अंदरूनी कार्य अधूरे पड़े हैं। स्थानीय लोगों ने बताया कि महीनों से निर्माण स्थल पर ठोस गतिविधि दिखाई नहीं दी, जबकि यह अस्पताल परकोटे के करीब 8 लाख लोगों के लिए बड़ी राहत बनने वाला था।
108 करोड़ की घोषणा, लेकिन अधूरा सपना
वर्ष 2021 के बजट में पिछली सरकार ने इस 300 बेड के अस्पताल की घोषणा की थी। 50 करोड़ रुपये सिविल वर्क और 58 करोड़ रुपये अत्याधुनिक उपकरणों के लिए स्वीकृत किए गए। अक्टूबर 2022 में काम शुरू हुआ और दिसंबर 2023 तक इसे पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन जनवरी 2026 तक भी अस्पताल पूरी तरह तैयार नहीं हो पाया। 28 फरवरी 2026 की नई डेडलाइन भी समाप्ति पर है, फिर भी प्रोजेक्ट अधूरा है।
300 बेड और आधुनिक सुविधाएं अब भी कागजों में
इस अस्पताल में एमआरआई, सीटी स्कैन, नेफ्रोलॉजी, गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी, कार्डियोलॉजी और न्यूरोसर्जरी जैसी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं शुरू होनी थीं। साथ ही ब्लड बैंक, मॉर्चरी, नवजात और गर्भवती महिलाओं के लिए आईसीयू, एनएबीएच लैब, आधुनिक इमरजेंसी, डेंटल और मानसिक रोग विशेषज्ञ की सुविधा भी प्रस्तावित थी। लेकिन दो साल से अधिक की देरी ने इन सभी सुविधाओं को अभी तक फाइलों में ही रोक रखा है।
मुख्य गेट विवाद बना अड़चन
डीपीआर के अनुसार अस्पताल का मुख्य गेट चौगान स्टेडियम की ओर खुलना था, लेकिन स्पोर्ट्स काउंसिल ने आपत्ति जता दी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए गेट निर्माण रुकवा दिया गया। इसके बाद ठेकेदार ने काम रोक दिया। भवन का स्ट्रक्चर खड़ा है, मगर फिनिशिंग का काम 29 महीनों से ठप है।
विधायक बालमुकुंदाचार्य के हस्तक्षेप से मामला उलझा
नई सरकार बनने के बाद स्थानीय विधायक बालमुकुंदाचार्य ने निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठाकर काम रुकवाया। जांच कमेटी बनी, रिपोर्ट में सुधार के साथ काम आगे बढ़ाने की सिफारिश भी की गई, लेकिन इसके बावजूद निर्माण दोबारा शुरू नहीं हो सका। अधिकारी भी मान रहे हैं कि विधायक के निर्देश के बिना काम आगे नहीं बढ़ेगा। इससे यह परियोजना राजनीतिक खींचतान में फंसती नजर आ रही है।
बढ़ती लागत, घटता भरोसा
लगातार देरी से लागत बढ़ने की आशंका है। पिछली सरकार ने बजट में घोषणा कर नींव रखी, लेकिन सरकार बदलने के बाद भी समय पर कार्य पूरा नहीं हो पाया। 29 महीने से बंद पड़े इस प्रोजेक्ट ने प्रशासनिक इच्छाशक्ति और विभागीय समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जनता के सब्र की आखिरी सीमा
परकोटे के बुजुर्ग, महिलाएं और मरीज आज भी बेहतर इलाज के लिए दूर अस्पतालों का रुख करने को मजबूर हैं। 300 बेड का यह सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल यदि समय पर बन जाता, तो हजारों लोगों को राहत मिलती। अब जनता पूछ रही है—आखिर जिम्मेदारी तय कब होगी और यह अस्पताल हकीकत में कब बदलेगा?
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