भ्रष्टाचार की जांच कमेटी बनाना समय बर्बाद करना है
विधायक निधि मामले पर सवाल
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। विधायक निधि में भ्रष्टाचार को लेकर मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने वरिष्ठ अधिकारियों की एक जांच कमेटी बनाई है। हालांकि, इस कदम को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह वास्तव में समस्या का समाधान है या केवल समय की बर्बादी?
जांच कमेटी का औचित्य क्या?
विधायक निधि में भ्रष्टाचार के मामले में विधायक और अधिकारी दोनों शामिल हैं। सरकार को चलाने वालों में भी यही विधायक और अधिकारी अहम भूमिका निभाते हैं। विडंबना यह है कि जांच कमेटी में भी अधिकारी ही शामिल हैं, जिनको अपने ही साथी अधिकारियों और विधायकों के खिलाफ जांच करनी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जांच में नया क्या बताया जाएगा? जबकि सब कुछ पत्रकारों के वीडियो में पहले से ही कैद है।
सरकार की स्थिरता और जांच का डर
यदि विस्तृत और निष्पक्ष जांच हुई, तो इसमें ज्यादातर विधायक और छोटे से लेकर बड़े अधिकारियों पर आंच आना शुरू हो जाएगी। जब बड़ी संख्या में विधायकों और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार में कार्यवाही की जाएगी, तो सरकार का चलना मुश्किल हो जाएगा। ऐसी स्थिति में इस जांच के कोई खास मायने नहीं रह जाते।
सभी जानते हैं कि सिर्फ विधायक निधि ही नहीं, बल्कि हर सरकारी योजना में धड़ल्ले से भ्रष्टाचार हो रहा है। अंतर सिर्फ इतना है कि तीन विधायकों के कारनामे कैमरे में कैद हो गए, जबकि अन्य भ्रष्टाचार छिपे तरीके से होते हैं।
सिस्टम में घुला-मिला भ्रष्टाचार
आम आदमी, सुरक्षा एजेंसियों, जांच एजेंसियों, उच्चाधिकारियों और नेताओं को भ्रष्टाचार की पूरी जानकारी है। इसलिए कमेटियां बनाना सिर्फ दिखावा मात्र है। भ्रष्टाचार तब ही समाप्त हो सकता है जब देश की जनता, नेता, मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी (IAS, IPS) यह ठान लें कि भारत को चीन, अमेरिका और जापान से आगे ले जाना है। वर्तमान में न्यायालय आदेश तो पारित कर रहे हैं, लेकिन न्याय कम दिखाई दे रहा है।
नगर निगम जयपुर में भ्रष्टाचार की स्थिति
नगर निगम जयपुर की ओर से प्रति वर्ष सड़कों, नालियों, भवनों, शौचालयों, ऑफिसों और सामुदायिक भवनों के निर्माण पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं।
कागजों में काम और 100% भ्रष्टाचार
यदि नगर निगम के कार्यों का फिजिकल वेरिफिकेशन करवाया जाए, तो कर्मचारी से लेकर मंत्री तक शायद ही कोई ऐसा मिले जिसके पास ‘भ्रष्टाचार का प्रसाद’ नहीं पहुंचा हो।
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विधायक निधि: यहाँ विधायकों, ठेकेदारों और अधिकारियों द्वारा लगभग 70 प्रतिशत राशि हड़पी जाती है।
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नगर निगम: यहाँ कई बार कागजों में ही सड़कें और सीवर लाइनें बन जाती हैं और 100 प्रतिशत राशि डकार ली जाती है।
आम आदमी की सुनवाई नहीं
नगर निगम में झाड़ू लगाने से लेकर कचरा उठाने तक, हर जगह भ्रष्टाचार हावी है। गलियां गंदगी से भरी हैं और बीमारियां फैल रही हैं, लेकिन कागजों में सब ठीक-ठाक है। नगर निगम जयपुर एक ऐसा विभाग बन गया है जहां आम आदमी की कोई सुनवाई नहीं होती। फिर भी सरकार अपनी उपलब्धियां गिनाने में पीछे नहीं रहती।
निष्कर्ष
तीनों विधायकों द्वारा विधायक निधि की राशि में भ्रष्टाचार की जांच करना या कमेटी बनाना महज समय की बर्बादी है। भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक बड़े और कड़े अभियान की जरूरत है, जो मौजूदा परिस्थितियों में संभव नजर नहीं आता।
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