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डिजिटल गिरफ्तारी और साइबर ठगी: डर, अविश्वास और तंत्र की खामियां

Jaipur

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आज का भारत डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है, जहां सुविधा के साथ-साथ ठगी के नए-नए रास्ते भी खुलते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में एक नया साइबर अपराध सामने आया है – “डिजिटल अरेस्ट”। इसमें अपराधी खुद को सीबीआई अधिकारी, एनआईए एजेंट या यहां तक कि जज बताकर लोगों को वीडियो कॉल पर धमकाते हैं, उन्हें फर्जी अपराधों में फंसाने की धमकी देते हैं, और फिर लाखों-करोड़ों की ठगी कर लेते हैं। लेकिन यह ठगी केवल तकनीक की नहीं, बल्कि व्यवस्था पर जनता के डर और अविश्वास की ठगी है। लोगों को लगता है कि पुलिस या एजेंसियाँ निर्दोष को भी आसानी से फंसा सकती हैं और न्यायालय भी अक्सर उन्हीं की बातों पर विश्वास कर लेता है। यह डर ही अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।

  • साइबर ठगों की रणनीति: कैसे फंसाते हैं जाल में?
  1. पहला कॉल: पीड़ित को किसी अज्ञात नंबर से कॉल आता है। कॉल करने वाला खुद को डाक विभाग, कूरियर सेवा या बैंक से जुड़ा कर्मचारी बताता है और कहता है कि किसी अवैध चीज़ (जैसे ड्रग्स, पासपोर्ट, संदिग्ध पैकेट) का भेजना आपके नाम से हुआ है।
  2. दूसरा कदम: कॉल को तुरंत किसी “सीबीआई अधिकारी” या “जज” से जोड़ दिया जाता है, जो वीडियो कॉल पर सरकारी पोशाक में होता है (deepfake/AI-generated visuals)। अब डराने का काम शुरू होता है।
  3. डिजिटल अरेस्ट: कहा जाता है कि आप अभी ‘डिजिटल अरेस्ट’ में हैं – आपको कैमरे के सामने ही रहना होगा। बातों-बातों में बैंक डिटेल्स, OTP, UPI ट्रांसफर या वीडियो रिकॉर्डिंग के जरिये ठगी कर ली जाती है।
  • आख़िर क्यों फंस जाते हैं पढ़े-लिखे लोग भी?
  1. व्यवस्था का भय: लोगों में यह धारणा गहराई से बैठी है कि अगर एक बार पुलिस या सीबीआई का नाम आ गया, तो बेगुनाही साबित करने में सालों लग सकते हैं।
  2. न्यायिक प्रक्रिया पर अविश्वास: आमजन को लगता है कि अदालतें शुरू में एजेंसियों की बातों को प्राथमिकता देती हैं। ऐसे में बेगुनाह भी दोषी मान लिया जाता है।
  3. मानसिक दबाव और शर्म: डिजिटल कैमरे के सामने बैठा व्यक्ति जब खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश करता है और सामने वाला उसे धमकाता है, तो वह खुद को ‘गुनहगार’ मानने लगता है।

कुछ चौंकाने वाले उदाहरण:

  1. मुंबई की महिला से 1.5 करोड़ की ठगी – एक साइबर अपराधी ने खुद को एनसीबी अधिकारी बताकर कहा कि महिला का आधार नंबर ड्रग्स तस्करी से जुड़ा है। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर उसे 3 दिन तक वीडियो कॉल पर बैठाकर धीरे-धीरे खाते से पैसे निकलवा लिए गए।
  2. दिल्ली में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर से 75 लाख की ठगी – सीबीआई अधिकारी बनकर आरोप लगाया गया कि उसके खाते से देशविरोधी फंडिंग हुई है। डर से उसने खुद ही ठगों के कहने पर कई ट्रांजैक्शन कर दिए।

समस्या की जड़: अविश्वास और डर

  1. भारत की व्यवस्था में आम आदमी को न्याय पाने की प्रक्रिया कठिन और महंगी लगती है। उसे लगता है कि—
  2. पुलिस चाहे तो किसी को भी उठा सकती है।
  3. अदालतें एजेंसियों की बातों को ही सही मान लेती हैं।
  4. सरकारी एजेंसियों से टकराने का मतलब जीवन बर्बाद हो जाना है।
  5. यही मानसिकता अपराधियों को मौका देती है कि वो ‘सरकारी एजेंसी’ के नाम का दुरुपयोग कर लोगों से पैसा ऐंठ लें।

समाधान क्या हो सकता है?

  1. जन-जागरूकता:

लोगों को यह समझाना ज़रूरी है कि कोई भी सरकारी एजेंसी कभी भी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती।

डिजिटल अरेस्ट जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

  1. प्रारंभिक कानूनी सहायता और परामर्श केंद्र:

हर जिले में ऐसी हेल्पलाइन होनी चाहिए जो तुरंत नागरिकों को इस तरह की धमकियों से निपटने की सलाह दे सके।

  1. पुलिस और न्यायालयों का आत्ममंथन:

आम आदमी में विश्वास लाने के लिए पुलिस को जवाबदेह और पारदर्शी होना पड़ेगा।

न्यायालयों को भी प्रारंभिक सुनवाई में संतुलन बनाए रखना होगा, ताकि एजेंसियों की बात अंतिम सच न मानी जाए।

  1. स्कूल स्तर पर डिजिटल साक्षरता:

बच्चों को शुरू से सिखाया जाए कि किसी भी अनजान कॉल, लिंक या धमकी से कैसे निपटें।

 बसंत हरियाणा

महासचिव, राजस्थान नागरिक मंच

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