टोंक रियासत में मेव क़ौम का योगदान
बात मेवात की….
बर्रे सग़ीर के दीगर इलाक़ों की तरह राजस्थान के नवाबी टोंक ज़िले की मेव क़ौम भी अपनी तारीख़ी धरोहर और शानदार सांस्कृतिक विरासत के लिए मशहूर रही है। यहाँ के अहम मेव-आबादी वाले गांवों में फ़ार्रुखाबाद/बीड़, अल्लाहपुरा, बाड़ा ज़ेरे किला, देवली गाँव, ठाठा इब्राहिमपुरा, ज्वाली, निमेडी, नानेर, मदारीपुरा, पीयावडी, और बासड़ा जैसे गाँव शामिल हैं। इसके अलावा, टोंक रियासत के पाँच दूसरे परगनों—अलीगढ़ (टोंक), छबड़ा (बारां), पिड़ावा (झालावाड़), निम्बाहेड़ा (चित्तौड़गढ़), और सिरोंज़ (देवास, एमपी)—के इलाकों में भी बड़ी संख्या में मेव क़ौम आबाद है। इसी क्रम में , निवाई और उनियारा के कस्बों और टोंक शहर के तालकटोरा इलाक़े में भी मेवों की ख़ासी तादाद बसर है। टोंक नवाबी रियासत में भी मेव क़ौम का आगमन मूल मेवात के इलाक़े से ही हुआ था। टोंक रियासत की मज़बूत फ़ौज में पश्तूनों के बाद मेवातियों का ही दबदबा था। मेव क़ौम ने अपनी असल मेवात की सरज़मीं पर खेती-बाड़ी और पशुपालन की पुरानी रवायत को क़ायम रखते हुए दूसरे इलाक़ों में भी इस जीवनशैली को बरकरार रखा, साथ ही सैन्य ख़िदमात को भी बख़ूबी अंजाम दिया।
टोंक के नवाब, जैसे अमीरूद्दौला (1769-1834), वजीरूद्दौला (1834-1864), नवाब मुहम्मद अली ख़ान (1864-1867), और नवाब इब्राहिम अली ख़ान (1867-1930) के दौर में मेव क़ौम को शहर कोतवाल से लेकर रियासत के अस्करी और गैर-अस्करी ओहदों पर काम करने के बेहतरीन मौक़े हासिल हुए, जहाँ उन्होंने अपनी क़ाबिलियत और वफ़ादारी का लोहा मनवाया। टोंक के नवाबों ने मेवों की तरक़्क़ी, तालीम और देखभाल के लिए कई छोटी-बड़ी जागीरें अता कीं, जिससे यह क़ौम सतत विकास के रास्ते पर आगे बढ़ती रही। आज भी टोंक शहर में मेव क़ौम की अच्छी ख़ासी आबादी मौजूद है, और कई सरकारी और गैर-सरकारी ओहदों के अलावा, टोंक नगर परिषद में भी मेव क़ौम से दो पार्षद—शाहिद सईद और ख़ालिद मेव—शामिल हैं। जहाँ मदारीपुरा गाँव में सौगन मेव गोत्र की बहुलता है, वहीं दूसरे गांवों और टोंक शहर में डेमरोत, दूलोत, भाबला, कलीशा, सिरौहिया, न्याई, बाघोडिया, नाहरवाडा, दंहगल, और सींघल जैसे गोत्रों के मेव अधिक संख्या में आबाद हैं।
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