भारत के विकास में अंग्रेजी साम्राज्य का योगदान
वर्तमान में विभिन्न संचार माध्यमों से लगातार ऐसा प्रचारित किया जा रहा है, मानों भारत में ही सब चीजों का अविष्कार हुआ हो ! अब तक जो पढ़ाया-बताया गया था, वह इतिहास झूँठा और गलत था, जिसे अंग्रेजों ने लिखा था और जो अब पढ़ाया जा रहा है, वही सच्चा इतिहास है। मैं न तो भारत विरोधी हूँ और न ही किन्ही अन्य नस्लों का समर्थक, लेकिन जो वास्तविक तथ्य हैं, उसे अपनाने और गलत बात को छोड़ने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। निःसन्देह हमारे देश भारत में भी अनेकानेक खोजें हुई है और उनको लोग जानते भी हैं, लेकिन भारत के विकास में किसी एक ही नस्ल का यागेदान मानना और अन्य के योगदान को नगण्य मानना गलत है। इसके अलावा जो खोजें भारत में हुई ही नहीं, उन्हें जबर्दस्ती अपना सिद्ध करना और भी गलत है। हमारे देश के विकास में विभिन्न नस्लों और बाहरी लोगों का समय-समय पर काफी योगदान रहा है। आज का जो भारत हम देख रहे हैं, वह किसी एक नस्ल के योगदान का परिणाम कतई नहीं है। इस लेख में केवल और केवल अंग्रेजो के योगदान की चर्चा की गई है, क्योंकि कई लोगों को उनके योगदान सूर्य की भाँति होने पर भी नहीं दिखते हैं। इन पर अतिवादी लोग विचार कर सकें कि जैसा वे समझते हैं, यदि ठोस धरातल पर उतर कर देखें तो वैसा नहीं है।
- पहनावे की बात करें तो पेण्ट, कोट, टाई, शर्ट आदि अंग्रेजी सभ्यता की देन हैं, जिनमें शरीर पूरा ढंक जाता है। आजकल अधिकांष जनता द्वारा यही पहनावा काम लिया जाता है।
- साइकिल से लेकर सभी दुपहिया, तिपहिया और चैपहिया वाहन, ट्रेन, हवाई जहाज आदि का आगमन अंग्रेजों के आगमन से ही हुआ। इनके आगमन से पूर्व समुद्री परिवहन के तौर पर नाव और काफी बड़े-बडे़ जहाज जरूर चला करते थे जो हवा के बहाव की सहायता से मानव शक्ति से चलते थे, लेकिन भाप की शक्ति या अन्य शक्ति का प्रयोग इनमें नही होता था।
- संचार के साधनों की बात करें तो टेली फोन, डाक, तार आदि भी अंग्रेजों के आगमन से ही भारत में आये। इसके पहले डाक व्यवस्था राजाओं-महाराजाओं और धनाढ्य वर्ग के लिए ही थी।
- छपाई का अविष्कार गुटनबर्ग ने किया था। इससे पहले सभी स्थानों पर हस्तलिखित ग्रन्थ ही प्रचलित थे। यह कला भी भारत में अंग्रेजों के साथ ही आई।
- आधुनिक शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों की ही देन है, जिसमें सभी जातियों और धर्मों के व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के एक साथ पढ़ाये जाते हैं। इसके पहले भारत में शिक्षा गुरुकुलों में और मदरसों में दी जाती थी। गुरुकुलों में शूद्रों का प्रवेश वर्जित था, अतः इनके लिए ये बेकार थे। मदरसों में इस्लाम धर्म की शिक्षा दी जाती थी, लेकिन शूद्रों का प्रवेश वर्जित नहीं था।
- आधुनिक सुविधाएं यथा नल, बिजली, पंखे, कूलर, टीवी, रेडियो, रेफ्रिजरेटर, टेपरिकार्डर, एसी, कम्प्यूटर, वाषिंग मषीन, बिजली की मोटर, इंजन और इसी प्रकार की सैंकड़ों जीवनोपयोगी वस्तुओं का आगमन अंग्रेजों के साथ ही भारत आईं या उनके द्वारा स्थापित शिक्षा पद्धति के सिद्धान्तों पर खोजी गई।
- शिक्षा का प्रचार-प्रसार विधिवत ढंग से हुआ। इससे हर क्षेत्र में उन्नति हुई। भारत की आजादी में अंग्रेजी शिक्षा का काफी यागे दान रहा। विदेशी क्रान्तियों की कहानियों को पढ़ने से भारत में भी स्वतन्त्रता प्राप्ति की भावना बलवती हुई। विदेशियों के सम्पर्क में रहने से सोचने-समझने के तरीकों में बदलाव हुआ। नेहरु, गाँधी, डॉ. अम्बेडकर, जिन्ना, सुभाषचन्द्र बोस, सरदार भगतसिंह, चन्द्रषेखर आजाद, डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार आदि अंग्रेजों द्वारा लागू शिक्षा पद्धति के ही स्कूल-कालेजों और विष्वविद्यालयों से निकले छात्र थे, न कि किसी गुरुकुल या मदरसे से।
- अंग्रेजों ने हिन्दू धर्म में प्रचलित अनेक कुप्रथाओं पर रोक लगाई, जिनसे सामाजिक और धर्मिक जीवन बदल गया। इनमें कन्या भ्रूण (और जन्म के बाद भी) हत्या, दास प्रथा, बालविवाह, शूद्र स्त्रियों के शुद्धिकरण की प्रथा, देवदासी प्रथा, गंगादान प्रथा, बेगार प्रथा, सती प्रथा, ठगी प्रथा, भवनों की नींव में दी जाने वाली नरबलि (चरक पूजा) प्रथा, मंदिरों में दी जाने वाली नरबलि प्रथा और बहुविवाह प्रथा प्रमुख थी।
- इसी प्रकार अंग्रेजों ने शूद्रों पर लादी गई अनेक निर्योग्यताएं भी समाप्त कीं। हिन्दुओं के कानून मनुस्मृति के अनुसार शूद्रों को पढ़ने-लिखने, हथियार रखने, कमाने और सम्पत्ति रखने का अधिकार नहीं था। अंग्रेजों ने स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों के दरवाजे शूद्रों के लिये खोले, जिनसे बाबा साहेब जैसे विद्वान निकले, फौज में भर्ती के लिए महार रेजीमेंट, जाट रेजीमेंट (1803) और चमार रेजीमेंट (1943) की स्थापना की, अपनी योग्यता के अनुसार किसी भी प्रकार का काम-धन्धा करने का अधिकार दिया और धन रखने का अधिकार दिया।
- समान न्याय व्यवस्था की स्थापना की। इससे पहले जाति आधारित न्याय व्यवस्था थी। सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक लगाई।
- शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।
- कन्याओं के पढ़ने के लिए विद्यालयों की स्थापित किए।
- कलकत्ता, मद्रास और बॅाम्बे में इनके ही नाम के विष्वविद्यालयों की स्थापना की गई।
- भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) लागू कर समान अपराध के लिए समान न्याय का प्रावधान किया। पहले जाति को देख कर दण्ड दिया जाता था और ब्राह्मण को मृत्युदण्ड नहीं दिया जाता था।
- जातिगत जनगणना की शुरुआत की, जिससे भिन्न-भिन्न जातियों की संख्या का पता चला। संख्या के आधार पर इनके विकास के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाने लगे। लेकिल बाद में इन जातियों का विकास सरकारों को रास नहीं आया और ’’जातिगत जनगणना से सामाजिक वैमनस्य फैलता है’’ ऐसा कहते हुए इस पर रोक लगा दी। जातिगत जनगणना से वंचित वर्ग की वास्तविक संख्या देश -दुनिया के सामने आने लगी थी और ये विधानसभा तथा संसद में संख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व की मांग करने लगे थे।
- अंग्रेजों ने शूद्रों को भी भूमि का मालिक स्वीकार किया, जबकि मनुस्मृति के अनुसार शूद्र भूमि के मालिक नहीं हो सकते थे।
- वयस्क मताधिकार, जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण, स्वतन्त्र निर्वाचन का अधिकार और दो वोट का अधिकार अंगे्रजो की ही देन थी। बाद में गांधी जी के अनशन करने के कारण दो वोट का अधिकार समाप्त कर दिया गया और पूना पैक्ट हुआ।
- शासन-प्रशासन में सबकी भागीदारी सुनिष्चित की गई। इससे शासन-प्रशासन में बनिया, कायस्थ, हाथ का काम करने वाली जातियों, अछूत और महाअछूत आदि सभी वर्गों के लोग आने लगे। इन योगदानों के अलावा और भी कई योगदान ऐसे रहे हैं जिनको लोग ईसाई धर्म को बढ़ावा देने वाले मानते हैं, लेकिन यह तो मानना पडे़गा कि अंग्रेज मिशनरियों ने मानव को मानव तो समझा और अछूतों, आदिवासियों तथा दलितों की बस्तियों में ज्ञान का प्रकाष फैलाया। वास्तव में तो धर्म मानव के लिए होना चाहिए न कि धर्म के लिए मानव। जब मानव ही नहीं बचेगा, तो धर्म की कितनी ही उन्नति हो, क्या फायदा? इस प्रकार भारत को विकसित बनाने में कई अन्य नस्लों के योगदान के अलावा अंग्रेजों का योगदान काफी महत्त्वपूर्ण रहा है, जिसे नकारा नहीं जा सकता है।
–डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा, भीलवाड़ा
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