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भारत में सुदृढ़ लोकतंत्र की स्थापना में डॉ. भीमराव अम्बेडकर का योगदान

जयपुर

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संविधान निर्माण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

किसी भी देश के प्रगति करने के लिये वहाँ के निवासियों द्वारा माने जाने वाले रीति-रिवाज़ और नियम काफी हद तक जिम्मेदार हैं। यही जब लिखित रूप में होते हैं तो संविधान कहलाते हैं। भारत में लोकतंत्र के पूर्व राजतंत्र था और इधर-उधर बिखरी रियासतें थीं, जिनका शासन मनुस्मृति अथवा कुरान के अनुसार चलता था। ब्रिटिश शासन पहले कम्पनी के तथा बाद में भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार चला।

आजाद भारत का संविधान बनाने हेतु 41 समितियां बनाई गईं, जिनमें संविधान प्रारूप समिति प्रमुख थी। इसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर थे तथा छः अन्य सदस्य थे। एक प्रकार से सारा कार्यभार डॉ. अम्बेडकर को ही वहन करना पड़ा, अतः वे ही संविधान निर्माता कहलाये। उन्होंने जो संविधान तैयार किया, वह विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान साबित हुआ।

संविधान की उद्देशिका और लोकतंत्र का संकल्प

इसकी उद्देशिका को ही देखें, तो पाते है कि उन्होंने भारत को सुदृढ़ लोकतंत्रात्मक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है:

“हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिये, तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिये तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिये दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

लोकतंत्र की स्थापना के लिये जिन-जिन तत्वों का होना आवश्यक है, वे सभी इसमें शामिल हैं।

बाबा साहेब का दृष्टिकोण और सामाजिक न्याय

संविधान सभा की 25 नवम्बर को आयोजित बैठक में बाबा साहेब ने कहा था, “संविधान सभा में मैं क्यों आया? केवल दलित वर्ग के हितों की रक्षा करने के लिये। इससे अधिक और मेरी कोई आकांक्षा नहीं थी। यहाँ मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी, इसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी।”

बाबा साहेब के बनाये संविधान से सभी नागरिकों को उचित न्याय मिला और देश प्रगति की राह पर आगे बढ़ा। विश्व में कई ऐसे देश हैं, जो भारत के साथ स्वतंत्र हुए (जैसे पाकिस्तान), परन्तु वहां लोकतंत्र के हालात सर्वविदित हैं। भारत में यदि लोकतंत्र सुरक्षित है, तो इसका श्रेय संविधान और डॉ. अम्बेडकर को जाता है।

समानता का अधिकार: एक व्यक्ति-एक मत

संविधान निर्माता के रूप में उन्होंने सभी प्रकार के भेद से ऊपर उठकर अपने कर्तव्यों को पूर्ण किया।

  • व्यक्ति की गरिमा: संविधान और शासन व्यवस्था का मुख्य केन्द्र ‘व्यक्ति’ को माना गया है।

  • समान मताधिकार: व्यक्ति चाहे चपरासी हो या राष्ट्रपति, भिखारी हो या खरबपति, ब्राह्मण हो या महादलित—सभी को एक ही वोट डालने का हक है और वोट का मूल्य भी एक ही गिना जाता है।

यह भारतीय संविधान को बाबा साहेब की अनूठी देन है। सामाजिक न्याय की धारणाओं में बाबा साहेब की धारणा सर्वोच्च ठहरती है, जिसका आधार समस्त प्राणियों की समानता, समान प्रतिष्ठा, और कमजोरों के प्रति सम्मान की भावना है।

बाबा साहेब की चेतावनी: अंतर्विरोधों का जीवन

संविधान सभा में दिये गये बाबा साहेब के ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने भावी खतरों के प्रति आगाह किया था:

“26 जनवरी 1950 को हम अन्तर्विरोधों की जिन्दगी में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हम समानता प्राप्त करेंगे और हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी। राजनीति में हम ‘एक आदमी-एक वोट, एक वोट-एक कीमत’ के सिद्धान्त को पाने जा रहे हैं, लेकिन हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में उक्त सिद्धान्त को अस्वीकार करते रहेंगे। अगर यह असमानता की स्थिति लगातार बनी रही तो राजनैतिक स्वतंत्रता खतरे में पड़ जायेगी।”

अतः संविधान निर्माता ने तो संविधान को सर्वश्रेष्ठ बना दिया, अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे ईमानदारी से लागू करें। यही बाबा साहेब को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक: डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा (सहायक प्रोफेसर, एमएलवीटीइसी, भीलवाड़ा)

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