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कांग्रेस के टिकट वितरण और अंदरूनी गुटबाजी के चलते भाजपा की जीत हुई आसान

Tonk

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टोंक (रॉयल पत्रिका)। देवली मैं हुए उपचुनाव में रॉयल पत्रिका का अनुमान बिल्कुल सही निकला और यहां से भारतीय जनता पार्टी के राजेंद्र गुर्जर जीत कर विधायक बन गए। अपनी जीत के दावे कर रही कांग्रेस को यहां शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। सियासी दाव –पेंच, अंदरूनी उठापटक और किंग बनने की रणनीति से बेखबर कांग्रेस उम्मीदवार के. सी. मीणा की यहां से जमानत जब्त हो गई। दमखम, जोश और रणनीति बनाकर जीत का दावा करने करने वाली कांग्रेस और उसके छोटे-बड़े नेता के. सी. मीणा की जमानत भी नहीं बचा पाए। अंदरुनी गुटबाजी, टिकट वितरण में सोची समझी रणनीति के तहत आखिरकार कांग्रेस को यहां हार का सामना करना पड़ा।  अगर यह कहा जाए कि कांग्रेस ने ही भारतीय जनता पार्टी की जीत की राह आसान कर दी, तो काफी हद तक यह गलत नहीं होगा। दरअसल निर्दलीय चुनाव लड़ रहे नरेश मीणा कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे। वह सचिन पायलट खे़मे के माने जाते हैं। यहां टिकट की जिम्मेदारी बहुत बड़ी हद तक यहां के पूर्व विधायक रहे और टोंक – माधोपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद हरीश मीणा के पास थी। अगर यूं कहा जाए कि इस सीट पर कौन उम्मीदवार होगा इसकी सारी जिम्मेदारी बहुत बड़ी हद तक हरीश मीणा के पास बताई जा रही थी। आमतौर पर ऐसा होता भी है की जो जहां से विधायक होता है उसी की बात को महत्व दिया जाता है। बहरहाल कांग्रेस प्रत्याशी और निर्दलीय प्रत्याशी के बीच में वोटो का जबरदस्त बटवारा हुआ। जिसका सीधा लाभ भाजपा के राजेंद्र गुर्जर को मिला। निर्णायक मानी जाने वाली दो जातियों में से मीणा जाति के वोट दो उम्मीदवारों में बंट गए जबकि गुर्जर समुदाय का एक मुश्त, पूरा वोट राजेंद्र गुर्जर के पास चला गया, जो होना ही था। उधर भाजपा से जुड़े अन्य वर्गों ने भी राजेंद्र गुर्जर को ही वोट दिया। यह और बात है कि टिकट नहीं मिलने पर नरेश मीणा कांग्रेस से नाराज होकर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में कूद गए, तो वहीं भाजपा से जिनको टिकट नहीं मिला उनमें से किसी ने भी बगावत नहीं की।  यहां राजेंद्र गुर्जर की जीत भारतीय जनता पार्टी सरकार की उपलब्धियां के आधार पर नहीं हुई है, कांग्रेस में गुटबाजी के कारण ही भाजपा की जीत यहां पर आसानी से हुई है। याद रहे कि पहले हुए चुनाव में भाजपा ने यहां कांग्रेस के हरीश मीणा के सामने गुर्जरों के प्रमुख नेता रहे किरोड़ी बैंसला के पुत्र विजय बैंसला को टिकट दिया था।  जो हरीश मीणा से 19175 मतों से हार गए थे। बहरहाल आज कुछ भी हो कांग्रेस के हाथों से निकली यह सीट अब भाजपा की झोली में चली गई है। कांग्रेस में सन्नाटा है। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस की हार को हरीश मीणा और सचिन पायलट की साख को जोड़कर देखा जा रहा है। सबको उम्मीद थी कि हरीश मीणा और सचिन पायलट यहां से कांग्रेस की डूबती नैया को पार कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ कांग्रेस ख़ेमे में गुटबाजी को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के मंत्रियों बड़े नेताओं और बहुत बड़े कार्यकर्ताओं की फौज ने देवली उनियारा में पांव जमा लिए। यहां राजेंद्र गुर्जर को 100599 मत पड़े जबकि के. सी. मीना मात्र 31385 मतों पर ही ठहर गए। वहीं निर्दलीय नरेश मीणा ने 59478 वोट लेकर अपना दम कम साबित किया। भाजपा यहां से 41121 वोटो से जीत गई। राजनीतिक क्षेत्रों में और खासतौर से कांग्रेस के ख़ेमो में यह चर्चा जोर-शोर से चल रही है क्या के. सी. मीणा को रणनीति के तहत इसीलिए टिकट दिया गया था कि वह जीत ही नहीं पांए, और यदि वह जीत भी गए तो वह कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए सरदर्द साबित नहीं होंगे। अगर हार गए तो भी कोई कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान नहीं होगा। यह तय था कि अगर नरेश मीणा को टिकट मिलता तो वह बहुत बड़े अंतर से कांग्रेस को जिता सकते थे। उधर दौसा में मुरारी लाल मीणा और सचिन पायलट की राय मशवरे से दीनदयाल बैरवा को टिकट दिया गया था और यहां से भाजपा के मजबूत और कद्दावर नेता किरोड़ी लाल मीणा के भाई जगमोहन मीणा को टिकट दिया गया था सारी कोशिशें के बावजूद भी किरोड़ी लाल मीणा जगमोहन को नहीं जीत पाए और यहां से कांग्रेस के दीनदयाल बैरवा 2300 वोटो से जीत गए।  दीनदयाल बैरवा को 75536 मत मिले, तो जगमोहन मीणा मात्र 73236 वोट ही ले पाए।  बहरहाल कुछ भी हो, कांग्रेस ने अपने हाथों में आई हुई यह सीट अपने ही रणनीति के चलते खो दी है।  भाजपा की जीत को कतई भाजपा सरकार की उपलब्धि या उसके कारनामे के आधार पर मिली जीत यहां पर नहीं मानी जा रही है। कुल मिलाकर कांग्रेसियों में चर्चा है कि इस सीट पर किंग बनने की चाहत में कांग्रेस को इस सीट का नुकसान उठाना पड़ रहा है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस और यहां के बड़े नेताओं को हिसाब से कोई ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है अभी यहां साफ तौर पर देखा जा रहा है कि हरीश मीणा और सचिन पायलट ही कांग्रेस के यहां दो दमदार और मुख्य नेता रहेंगे उधर इस बात की भी जोरदार चर्चा जारी है की नरेश मीणा को पर्दे के पीछे रहते हुए भारतीय जनता पार्टी और भाजपा सरकार ने नरेश मीणा को काफी सपोर्ट किया। यह भी कहा जा रहा है किरोड़ी लाल मीणा के सपोर्ट मिलने के बाद नरेश मीणा मजबूती से मैदान में आखिर तक डटे रहे। फिलहाल अभी नरेश मीणा जेल की सलाखों के पीछे हैं। इस चुनाव में हालांकि हरीश मीणा को यह पूरी उम्मीद थी कि के. सी. मीणा को यहां से जिताकर विधानसभा में भेज देंगे। लेकिन उनका यह अनुमान तब गलत साबित हुआ जब निर्दलीय नरेश मीणा ने मैदान में ताल ठोक दी। हरीश मीणा को यह आभास नहीं था कि नरेश मीणा निर्दलीय रहकर चुनाव मैदान में कूद जाएंगे अब जो भी हो सचिन पायलट और हरीश मीणा के लिए कहा जा रहा है यह हारी हुई बाजी पलटने में नाकाम रहे।

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