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ऑपरेशन सिंदूर का राजनीतिक फायदा लेना चाहती हैं भाजपा

जयपुर

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जयपुर,(रॉयल पत्रिक)। पहलगाम आंतकी हमले के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। भारतीय सेना ने जिस प्रकार पाकिस्तान के खिलाफ कार्यवाही की उससे भारतीय सेना का साहस और पराक्रम सबने देखा। लेकिन देश के नेतृत्व की कमजोरी भी सबके सामने दिखाई दी। जब भारतीय सेना ने पाकिस्तान पर हर क्षेत्र में बढ़त लेली और पाकिस्तान के मिसाईल, ड्रोन और लड़ाकू विमानों के हमलो को नाकाम कर दिया, उसी दौरान अमेरिका के दवाब में भारत सरकार ने युद्ध विराम समझौता कर लिया। युद्ध विराम को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई अंतराष्ट्रीय मंचों से भारत को बेईज्ज़त किया और युद्ध विराम करवाने का पूरा क्रेडिट लेने की कोशिश की। दूसरी तरफ पाकिस्तान की तरफ झुकाव भी दिखाया। युद्ध के दौरान आईएमएफ ने अमेरिका के इशारे पर पाकिस्तान को लोन की किस्त भी जारी की। भारतीय नेतृत्व का युद्ध के दौरान दूसरे देशों से कैसे संबंध हैं भी पता चला। युद्ध के दौरान एक मात्र इजराईल के अलावा कोई भी भारत के पक्ष में खुलकर नहीं बोला। जबकि चीन, तुर्की और अजरबेजान जैसे देशों ने खुलकर पाकिस्तान का पक्ष लिया। ज्यादातर मुस्लिम देश संतुलन बनाकर वक्तव्य दे रहे थे। भारत की हमेशा सेन्य सहायता और खुलकर पक्ष में बोलने वाला रूस भी इस बार भारत के पक्ष में नहीं बोला। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। ऐसी कैसी विदेशनीति है कि भारत के प्रयासों से आजाद होने वाला बंगलादेश भी खिलाफ में बोल भी रहा है और खिलाफ में चल भी रहा है। गोदी मीडिया ने हर भारतीय के दिमाग में बैठाया था कि मोदी के नेतृत्व में पूरे विश्व में भारत का डंका बज रहा है। पाकिस्तान से युद्ध के दौरान सिर्फ भारतीय सेना का डंका बजता नजर आया बाकि सभी गायब था। शायद प्रधानमंत्री जी को भी अहसास हुआ कि जो विदेशी दौरो में यूरोपीय और मुस्लिम देश उनसे नज़दीकी दिखा रहे थे, युद्ध के दौरान वे सब बदले बदले से नजर आ रहे थे। देश के अन्दर सभी राजनीतिक दलों एव विपक्षी दलों ने एकतरफा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अधिकार दिया था कि देश हित प्रधानमंत्री जो भी निर्णय लेगे, सभी विपक्षी नेता उनका अनुसरण करेगें और किया भी। देश में जाति, धर्म एवं अन्य विवादों को भूलाकर प्रधानमंती नरेन्द्र मोदी जी और सरकार के साथ सभी नागरिक वर्ग दिखाई दिए। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान की जीत में योगदान देश के सभी लोगों, नेताओ, सुरक्षाबलो, सेना को जाना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री ने युद्ध के बाद जिस प्रकार बिहार जाकर चुनावी रैलियों को संबोधित किया, उससे तो ऐसा लगने लगा है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत पाकिस्तान युद्ध का अकेले ही क्रेडिट लेना चाहते है और बिहार विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता से वोट लेना चाहते हैं। इसलिए विपक्ष भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के विरोध में अभियान चला रहा है। वैसे होना यह चाहिए कि भारत पाकिस्तान के मुद्दे को राजनीति से दूर रखना चाहिए। राजनीतिक पार्टियों को सिर्फ शिक्षा, रोजगार एवं विकास के मुद्दों पर ही चुनाव लड़ना चाहिए लेकिन चुनावों में धर्म एवं अन्य गैर जरूरी चीजें ज्यादा दिखाई देती है।

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