बिहार विधानसभा चुनाव ऑपरेशन सिंदूर और जातिगत जनगणना जैसे मुद्दों पर लड़ा जाएगा
- विकास रोजगार एवं शिक्षा जैसे मुद्दों से जनता को भड़काने की पूरी कोशिश की जाएगी
जयपुर (रॉयल पत्रिका)। भारत पाकिस्तान युद्ध का अब अंत हो चुका है । भारत-पाकिस्तान युद्ध में देश की सेना ने अपनी क्षमता साबित करके दिखा दिया कि उसके रहते भारत की सीमाओं को कोई बुरी नजर से देख भी नहीं सकता है । देश की सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टियां पाकिस्तान के खिलाफ एक जुटता दिखाई दी । देश का हर वर्ग, समुदाय और जाति का व्यक्ति देश की सेना और देश के नेतृत्व के साथ दिखाई दिया । लेकिन जैसे-जैसे समय व्यतीत होता जा रहा है, सत्ताधारी नेता और विपक्षी नेता भारत-पाकिस्तान युद्ध को एक दूसरे के खिलाफ वोट जीत का श्रेय लेने की कोशिश में लगे हैं । भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर दूसरे नेता पाकिस्तान पर जीत बताकर देश की राजनीति की दिशा बदल रहे हैं । इसी तरह विपक्षी नेता राहुल गांधी, अखिलेश यादव, संजय सिंह, ममता बनर्जी सहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं की कमियां पता कर जनता के बीच जा रहे हैं। विपक्ष नेता भारत पाक युद्ध में सेना की भूमिका को महत्वपूर्ण बताकर तारीफ कर रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी पर जल्दबाजी में और अमेरिका के दबाव में युद्ध विराम करने का आरोप लगा रहे हैं। विपक्षी नेता जाति जनगणना को भी मुद्दा बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पक्ष विपक्ष की राजनीति के चलते लगने लगा है कि बिहार विधान का चुनाव ऑपरेशन सिंदूर और जातिगत जनगणना को आधार बनाकर लड़ा जाएगा। बिहार में जीत किसकी होगी, यह अभी कहना जल्दबाजी होगी ।
- विकास एवं रोजगार के मुद्दों को बुलाने की कोशिश होगी
विधानसभा चुनाव में इस बात की पूरी संभावना है कि पार्टियां विकास, रोजगार एवं शिक्षा के मुद्दों पर चुनाव नहीं लड़ेंगी ।बिहार प्रदेश को प्रदेश का सबसे पिछड़ा प्रदेश माना जाता है। बिहार में जातिवाद, धार्मिक मुद्दे मुख्य रूप से चुनाव में हावी रहेंगे। बिहार में शिक्षा दूसरे प्रदेशों की तुलना में काफी कम है, बेरोजगारी ज्यादा होने के कारण बिहार के ज्यादातर लोग मजदूरी करने दूसरे प्रदेशों में जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद राजनीति में उच्च जातियों का बिहार में वर्चस्व रहा था, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की पिछड़ों की राजनीति ने बिहार के राजनीति के समीकरण बदल दिए और बिहार के दो बार मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी पिछड़ों की राजनीति करते हैं । दलित के कद्दावर नेता रामविलास पासवान ने दलितों को जागरूक करके दलित केंद्रित राजनीति की। बीजेपी बिहार में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करती है। धार्मिक मुद्दों को उभारकर बीजेपी बिहार में तेजी से उभर रही है। आगामी विधानसभा चुनाव में यहां विकास, रोजगार एवं शिक्षा कोई मुद्दा नहीं रहने वाला है, क्योंकि देश की जनता अपनी वास्तविक समस्याओं को भूलकर चुनाव के वक्त भावनात्मक मुद्दों के आधार पर पार्टियों और उम्मीदवारों को वोट देकर जिताती है। यही कारण है कि नेता चुनाव बाद जनता को भूल जाते हैं और उसकी समस्या के समाधान की कोशिश नहीं करते हैं।
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