अबू नसर मंसूर:
वो ‘शाही’ गणितज्ञ जिन्होंने अल-बिरूनी को गढ़ा और त्रिकोणमिति को नई दिशा दी
मुस्लिम जगत के महान खगोल शास्त्री
मुस्लिम जगत में 10वीं-11वीं सदी के मशहूर गणितज्ञ और खगोल शास्त्री अबू नसर मंसूर एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे। इनका पूरा नाम अबू नसर मंसूर इब्न अली इब्न इराक अल-जदी था। इनका जन्म सन् 960 में गिलान (ईरान) में हुआ था और निधन लगभग 1036 ई. में गज़नी (आधुनिक अफ़गानिस्तान) में हुआ।
अबू नसर मंसूर केवल एक विद्वान ही नहीं, बल्कि ख़्वारज़्म के हुक्मरान और अफ्रीगिड्स सल्तनत के शाही प्रिन्स भी थे। उनका परिवार ‘बानू इराक’ अराल समुद्र से सटे ख़्वारज़्म (वर्तमान उज़्बेकिस्तान) का शासक था। यहीं उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की और महान गणितज्ञ अबुल-वफ़ा से तालीम हासिल की।
गुरु-शिष्य का अनोखा रिश्ता: मंसूर और अल-बिरूनी
अबू नसर मंसूर का सबसे बड़ा योगदान केवल उनकी खोजें नहीं, बल्कि महान विद्वान अल-बिरूनी को तैयार करना भी था। उन्होंने लगभग 990 ईस्वी से अल-बिरूनी को पढ़ाना शुरू किया। 1004 ईस्वी से अल-बिरूनी ने एक सहयोगी के तौर पर उनके साथ काम करना शुरू किया।
इन दोनों के बीच का संबंध इतना गहरा था कि अल-बिरूनी ने लिखा:
“मेरे गुरु अबू नसर ने जो मुझे सिखाया, वह केवल गणित नहीं था, बल्कि सत्य को खोजने की दृष्टि थी।”
मंसूर ने अल-बिरूनी की प्रतिभा को देखते हुए अपनी कई मूल खोजें (Original Discoveries) अपने शिष्य के नाम कर दीं, ताकि उन्हें प्रसिद्धि मिल सके। अबू नसर के कई काम अल-बिरूनी को ही समर्पित थे।
राजनीतिक उथल-पुथल और गज़नी का सफर
सन् 995 में तख्ता पलट होने के बाद अबू नसर मंसूर, अली इब्न मामून के दरबार में चले गए। बाद में, सन् 1017 ईस्वी में, वे सुल्तान महमूद गजनवी के अधीन गजनी साम्राज्य में चले गए, जहां उन्होंने अपना शेष जीवन व्यतीत किया।
गणित और खगोल शास्त्र में योगदान
अबू नसर मंसूर ने कुल 25 ग्रंथ लिखे, जिनमें से 17 आज भी सुरक्षित हैं। इनमें 7 गणित पर और शेष खगोल शास्त्र पर आधारित हैं। उनके काम का महत्व इससे पता चलता है कि उनकी बची हुई कृतियों का अनुवाद कई यूरोपीय भाषाओं में किया गया है।
उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान त्रिकोणमिति (Trigonometry) के क्षेत्र में है। उन्हें ‘ज्या नियम’ (Law of Sines) की खोज करने या उसे आधुनिक स्वरूप देने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने समतल और गोलाकार दोनों प्रकार के त्रिभुजों के लिए यह नियम प्रतिपादित किया।
पृथ्वी की परिधि और अल-बिरूनी का प्रयोग
अबू नसर मंसूर के सिद्धांतों का ही परिणाम था कि उनके शिष्य अल-बिरूनी ने पृथ्वी की परिधि (Circumference) को सटीकता से मापा। भारत के पंजाब क्षेत्र (नंदना) में अल-बिरूनी ने मंसूर द्वारा विकसित त्रिकोणमितीय सूत्रों का उपयोग करके एक ऊंचे पहाड़ से पृथ्वी को मापा।
उनकी गणना 40,000 किमी थी, जो आधुनिक माप (40,075 किमी) के 99% करीब थी।
अबू नसर मंसूर के प्रमुख ग्रंथ
उन्होंने प्राचीन यूनानी गणितज्ञों जैसे मेनेलॉस और टॉलेमी के विचारों को संरक्षित और विकसित किया। उनके प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:
-
अल-मुʿज्जमात (The Tables): ज्या, कोसाइन आदि के मानों की विस्तृत तालिकाएँ, जो खगोलीय गणनाओं के लिए उपयोगी थीं।
-
मेनेलॉस की ‘स्फेरिका’ का पुनरुद्धार: उन्होंने यूनानी गणितज्ञ मेनेलॉस की लुप्त हो चुकी पुस्तक का अरबी संस्करण तैयार किया।
-
अल-मजिस्ती अल-शाही (Almagest of the Shah): खगोल विज्ञान पर उनकी मुख्य पुस्तक।
-
रिसाला फि मजज़त दवाइर अस-सुमुत: एस्ट्रोलैब (Astrolabe) के निर्माण और उपयोग पर गाइड।
-
किताब फि सुन’अत अल-मुसब्ब: सात भुजाओं वाली आकृति (Heptagon) के निर्माण की जटिल समस्या का समाधान।
-
किताब अस-सुमुत: मक्का की दिशा (किबला) निर्धारित करने की विधियों पर।
सम्मान
खगोल विज्ञान में उनके अतुलनीय योगदान के सम्मान में, चंद्रमा पर एक क्रेटर (गड्ढे) का नाम ‘अबू नसर’ (Abu Nasr) रखा गया है।
– प्रस्तुति: फ़ज़लुर्रहमान
Disclaimer
Royal Patrika is an independent news portal and weekly newspaper. Content is published for informational purposes only. Royal Patrika does not take responsibility for errors, omissions, or actions taken based on published information.
Royal Patrika एक स्वतंत्र समाचार पोर्टल और साप्ताहिक समाचार पत्र है। यहां प्रकाशित सामग्री केवल सूचना के उद्देश्य से है। प्रकाशित जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय, त्रुटि या नुकसान के लिए Royal Patrika जिम्मेदार नहीं होगा।
