अबु अब्दुल्लाह अहमद बिन मुहम्मद बिन हंबल शैबानी
इमाम हम्मबल र अ का पूरा नाम अबू अब्द अल्लाह अहमद इब्न मुहम्मद इब्न सानबल इब्न हिलाल इब्न असद इब्न इदरीस इब्न अब्द अल्लाह इब्न सय्यान अल-शायबानी अल- धुहली है । आप का जन्म 12 रबी-उल-अव्वल 241 हिजरी में बग़दाद शरीफ, ख़िलाफ़त ए अब्बासिया के दौर में हुआ था। आप का लक़ब शेख उल इस्लाम है। आप का परिवार मूल रूप से बसरा का था , और अरब बानू धुहल जनजाति से संबंधित था। आपके पिता खुरासान में अब्बासिद सेना में एक अधिकारी थे और बाद में अपने परिवार के साथ बगदाद में बस गए । इब्न हंबल र अ के पिता का देहान्त जब आप छोटे से बच्चे थे तभी हो गया था , फिर उनकी माँ ने उन्हें उनके पिता के परिवार के लोगों की देखरेख में पाला। इब्न हंबल र अ ने चालीस साल की उम्र तक शादी नहीं की क्योंकि वह इल्मे दीन हासिल करते रहे , वह बहुत यात्राएं करते थे इल्मे दीन की खोज में दूर-दूर तक यात्राएं की,अपने समय के महान गुरुओं से सीखने की चाहत में, आप ने इराक के कुफा और बसरा शहरों की यात्राएं की; अरब में मक्का , हिजाज़ और मदीना ; और यमन और सीरिया की यात्रा की। उन्होंने पवित्र शहर मक्का की पाँच बार हज मुबारक के लिए यात्रा की, जिनमें से तीन बार पैदल यात्रा की। इस तरह इल्म प्राप्त करने में लंबा समय बिताया। आप की पहली बीवी एक अरब खातून थी जिसके साथ रहते हुए उनसे कभी कोई मतभेद नहीं हुआ। पहली बीवी की वफात ( इन्तकाल) के बाद आप ने दूसरी शादी की। आप की दूसरी बीवी एक आंख वाली के नाम से जानी जाती थी और वह बेहद दीनदार खातून थी। दूसरी बीवी का नाम रेहाना था । आपकी एक ओर बीवी थी जिसका नाम हुस्न था।अहमद बिन हम्मबल र अ के आठ बेटों में, सालेह और अब्दुल्ला न्यायशास्त्र में निपुण थे, जबकि सईद बाद में कूफ़ा के न्यायाधीश बने।
इब्ने हम्मबल र अ की मृत्यु शुक्रवार, 12 रबी अल-अव्वल, 241 हिजरी को लगभग 75 वर्ष की आयु में बगदाद में हुई। इतिहासकार बताते हैं कि उनके अंतिम संस्कार में 800,000 पुरुष और 60,000 महिलाएँ शामिल हुईं और उस दिन 20,000 ईसाई और यहूदी इस्लाम में परिवर्तित हुए। इनकी कब्र अल-रुसाफ़ा जिले में अहमद इब्न हंबल मस्जिद के परिसर में स्थित है। इमाम अहमद बिन हंबल र अ प्रमुख इस्लामी विद्वानों में से एक हैं और उन्हें शेख-उल-इस्लाम (इस्लामी विज्ञान के उत्कृष्ट विद्वान) की उपाधि दी गई है। वह फ़िक़्ह, हदीस और कई अन्य इस्लामी न्यायशास्त्र में इमाम थे। वास्तव में, वह सुन्नी विधिशास्त्र के भीतर इस्लामी कानूनी ज्ञान (फ़िक़्ह) के चार स्कूलों या संस्कारों में से एक के संस्थापक हैं। अब्बासिद खलीफा अबुल-अब्बास अल-मामून द्वारा इस्लामी विद्वानों को दंडित किया जाता था, कैद किया जाता था, या यहां तक कि मार दिया जाता था जब तक कि वे उस समय के कुछ लोगों द्वारा स्व-निर्मित और झूठे अल-मुताज़िला धर्मशास्त्र के अनुरूप नहीं होते थे। यह नीति पंद्रह वर्षों तक चली और उस समय के अधिकांश खलीफाओं द्वारा इसका व्यापक समर्थन किया गया। खलीफा ऐ वक़्त कुरान पाक के अनिर्मित होने के बजाय सृजित होने के मुताज़िली सिद्धांत को अपनाने के लिए दबाव डालकर अपने धार्मिक अधिकार का दावा करना चाहता था लेकिन अहमद बिन हम्मबल र अ ने नहीं माना और यही कहा के क़ुरान पाक अल्लाह का कलाम है यह इन्सान के ज़रिए बनाया गया नहीं है। इस पर उन्हें कोड़े लगाए गए , ज़ंजीरों में बांधा गया और बगदाद भी छुड़वाया गया। बहुत अज़ीयत दी गई मगर इमाम हम्मबल र अ ने यही कहा के क़ुरान पाक अल्लाह का कलाम है।इमाम अहमद बिन हम्मबल र अ ने 225 हिजरी से हदीस पढ़ाना बंद कर दिया था। उन्होंने अपने दो बेटों अब्दुल्ला और सालेह को छोड़कर किसी को भी हदीस नहीं सुनाई। यह इमाम के लिए खाली समय था और उन्होंने 225 से 227 हिजरी के दौरान अपने बेटों और अपने पैतृक चचेरे भाई हंबल बिन इसहाक को अपनी महान पुस्तक अल-मुसनद सुनाई। इमाम अहमद ने बहुत सारी रचनाएँ लिखीं। उनकी रचनाओं में शामिल हैं:
- अल-मुसनद: (इस पुस्तक में 30,000 हदीसें हैं)
- रेसाला सलात : (प्रार्थना में होने वाली सामान्य गलतियों पर एक छोटी पुस्तक)
- मसाईल: (इमाम अहमद द्वारा जारी फतवों का संग्रह)
- अल अशरीबा: (अवैध पेय/पेय के बारे में स्पष्टीकरण)
- फ़ज़ैल अल-सहाबा: [यह पुस्तक पैगंबर मोहम्मद (SAW) के साथियों के गुणों के बारे में है ।
फ़ज़लुर्रहमान
सहायक सचिव (सेवानिवृत्त)
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