नियत से तय होती ज़िन्दगी
हदीस-ए-मुबारका में आता है
“जिसने अल्लाह ही की रज़ा के लिए मोहब्बत की, अल्लाह ही की रज़ा के लिए दुश्मनी की, अल्लाह ही की रज़ा के लिए दिया और अल्लाह ही की रज़ा के लिए रोक दिया — तो उसने अपना ईमान पूरा कर लिया।”
(सुन्नन अबू दाऊद: 4681)
इस हदीस में अपने ईमान को पूरा करने की निशानी बताई गई है कि इंसान जो कुछ करे, वह सिर्फ अल्लाह ही के लिए करे। उसकी मोहब्बत, उसकी नफ़रत — सब अल्लाह ही के लिए हो। मतलब यह कि हम जो भी काम करें, उसमें नीयत हमारी अल्लाह को राज़ी करने की हो। अगर इंसान खर्च करे, तो इस नीयत से करे कि इसमें अल्लाह की रज़ा हासिल करने का मकसद हो।
अगर हम आखिरी पैगंबर ﷺ की ज़िंदगी में गौर करें, तो हमें मालूम होगा कि जैसी एक आम इंसान की ज़िंदगी होती है, वैसी ही आपकी ﷺ ज़िंदगी थी। जैसे एक इंसान शादी करता है, आपने भी शादी की। इंसान अपने बच्चों से मोहब्बत करता है, आप ﷺ भी करते थे। इंसान नौकरी और व्यापार करता है, आपने भी व्यापार किया। वो सारे काम जो एक आम आदमी करता है, वो सब आपने भी किए। लेकिन इन सबके बावजूद आप अल्लाह के सबसे प्यारे बंदों में शामिल थे।
हम हैरान हैं कि असल राज़ क्या है? असल बात यह है कि आप ﷺ अल्लाह के रसूल तो थे ही, साथ ही आपकी नीयत इतनी पाक और साफ थी कि उसमें सिर्फ और सिर्फ अल्लाह को राज़ी करने की लगन थी। इसी लिए आप ﷺ अल्लाह के महबूब थे।
अब बात करते हैं कि हमारी नीयत कैसे ख़ालिस हो ताकि हमारा भी ईमान पूरा हो जाए।
अपनी नीयत को ख़ालिस करने के लिए मैं आपको एक अभ्यास बताता हूँ। आप इसे रोज़ करें, तो देखेंगे कि धीरे-धीरे आपकी नीयत अल्लाह के लिए ख़ालिस होने लगेगी और आपकी ज़िंदगी में अल्लाह की रहमत और बरकत आने लगेगी, इंशा अल्लाह।
मान लीजिए आपको बहुत तेज़ भूख लगी है। आप घर में दाख़िल हुए और आपके सामने दस्तरख़्वान बिछाया गया। उस पर गरम-गरम लज़ीज़ खाना रखा है, जिसमें से बहुत प्यारी खुशबू आ रही है। आपका दिल चाह रहा है कि तुरंत उस पर टूट पड़ें और उस खाने का मज़ा लें। लेकिन एक लम्हे के लिए रुक जाएँ और दिल में यह ख्याल लाएँ कि यह नफ़्स की ख्वाहिश से खाना नहीं खाएँगे। फिर यह सोचें कि अल्लाह तआला ने मेरे नफ़्स का मुझ पर हक़ रखा है, और हज़रत ﷺ की आदत थी कि जब आपके सामने खाना आता, तो आप शुक्र अदा करते हुए और खाने की तरफ रग़बत ज़ाहिर करते हुए खाना खाते थे। मुझे आपकी ﷺ सुन्नत की इत़्बा करनी चाहिए। इसलिए मैं आपकी इत़्बा में खाना खा रहा हूँ।
फिर खाना शुरू करें। इसी तरह बहुत से कामों में, जैसे आप अपने बच्चों से मोहब्बत करें, तो यह सोचें कि मैं अपने बच्चों से मोहब्बत इस लिए ज़ाहिर कर रहा हूँ क्योंकि मैं अल्लाह के रसूल ﷺ की इत़्बा कर रहा हूँ। आप इसे अपनाइए और देखेंगे कि आपकी नीयत ख़ालिस हो जाएगी अल्लाह के लिए और आपकी ज़िंदगी में बरकतें होंगी।
(मुहम्मद सुहैल)
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