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एक हिकायत अयाज़ की

Jaipur

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मौलाना रूमी रह. अ. ने अपनी मसनवी शरीफ में एक वाकिआ लिखा है कि अयाज़ नाम का एक बहुत गरीब शख़्स था, महमूद बादशाह‌ ने उसके अच्छे व आला अखलाक के सबब उसको अपना महबूब और मुकर्रब बना लिया था, लेकिन अयाज़ जिस दिन शाह महमूद के यहाँ हाज़िर हुवा था तो उस दिन उसके पास सिर्फ एक पुरानी गुदड़ी थी और एक पुरानी खाल थी, जिसको अयाज़ ने हुजरे (कमरे) में ताला डाल कर रखा था, और हर रोज़ अकेला उस हुजरे में जाता और अपनी गुदड़ी को देखता और अपने नफ्स को मुखातिब करके यह कहता था कि ए अयाज़ एक वो दिन था कि इसी बोसीदा (फटी पुरानी) गुदड़ी में तू यहां आया था और आज तू बादशाह का खास (मुकर्रब) नजदीकी बना हुआ है। देख अपनी हकीकत को मत भूलना, तुझ पर शाह की नज़रे इनायत बहुत है, नाज़ और तकब्बुर (घमन्ड) में मुब्तला ना होना, बल्कि यह शुक्र का मक़ाम है, कि यही गुदड़ी पहनने वाला आज सुल्तान का महबूब व मुकर्रब बना हुआ है। जिससे आज तमाम वुज़रा और हुक्मरा लरज़ते (डरते) हैं और कांपते हैं। रफ़्ता-रफ्ता यह खबर आम हुयी यानि सारे मुल्क में फैल गयी। तमाम वुजरा व हुक्मरानों को पहले से ही अयाज़ से हसद व जलन थी कि एक मामूली गरीब आदमी आज हम सबसे आगे निकल गया कि इस से बढ़कर शाह ‌मह‌मूद का कोई मुकर्रब, नज़दीकी और महबूब नहीं है। हसद व जलन रखने वाले आपस में बातें बनाने लगे कि अयाज़ रोज़ अकेला हुजरे में जाकर क्या करता है? और हुजरे पर हर वक्त ताला क्यों डाले रखता है। हो न हो यह खुफि‌या-खुफिया (छुपा-छुपाकर) शाही खज़ाने से माल व दौलत चुरा-चुरा कर जमा कर रहा है, बस सुल्तान को इसकी इस हरकत की खबर करनी चाहिये ताकि अयाज़ की सुल्तान से यह नज़‌दीकी और तकर्रूब खत्म हो जाये और सुल्तान का गज़ब व गुस्सा नाज़िल हो और सुल्तान को उससे नफरत हो जाये।

बस तमाम वज़ीरों और हुक्मरानों ने आपसी मश्वरे के बाद सुल्तान “महमूद को खबर दी कि अयाज़ गन्दुमनुमा जो फरोश है यानि दौलत का भूखा व लालची किस्म का इन्सान है। वो आपका सच्चा आशिक नहीं है मुनाफिक है। इसने खज़ाने शाही से चुराकर अपने खास हुजरे में सीमोज़र (चांदी व सोना) जमा कर रहा है।

सुल्तान मह‌मूद को अयाज़ के मुताल्लिक ऐसी हरकत का गुमान तक भी न हु‌आ, लेकिन अराकीन पर हुज्जत तमाम करने के लिये और अयाज़ का मकामे मोहब्बत और उसकी सदाकत ज़ाहिर करने के लिये हुक्म नाफ़िज़ कर दिया कि आधी रात को अयाज़ के हुजरे की तलाशी ली जाये, अराकीन सलतनत बडे खुश हुये कि आज रात में अयाज़ की कलई खुल जायेगी, और उसका बाद‌शाह से तकर्रुब खत्म हो जायेगा।

चुनाचे आधी रात को उस के हुजरे का ताला तोड़ा गया, और हुक्कामे सल्तनत ने हुजरे के अन्दर तलाशी ली, लेकिन सिवाय एक पुरानी गुद‌ड़ी और बोसीदा पोसतीन (फटी पुरानी खाल) के हुजरे में कुछ ना था और हासेदीन (जलने वालों) ने हुजरे की ज़मीन भी इस शुबे में खोदी कि शायद सोना,चांदी व मालो दौलत गाड़ या छुपा रखा हो और गुद‌ड़ी को धोका देने के लिये टांग रखा हो। बिल आखिर तलाशी लेने वाले हुक्काम तहार्दस्त (खाली हाथ) और नामुराद सुल्तान महमूद की खिदमत में हाज़िर हुये, और बहुत ही शर्मिन्दगी और खिसयाने होकर माफ़ी तलब करने लगे।

सुल्तान महमूद पर उस वक्त अयाज़ की मोहब्बत का एक हाल गुलिब हो गया और उसकी मोहब्बत में सरशार होकर उसने अयाज़ से पूछा,  ऐ अयाज़ इस कदर एहतमाम से इस गुद‌ड़ी और पोस्तीन बोसीदा को हुजरे में क्यों ताला डाल कर रखा है? अयाज ने अर्ज किया कि हुजूर में हर रोज़ अपनी इस गुद‌ड़ी और पोसतीन बोसीदा को देख कर इबरत हासिल करता हूं, और अपने नफ्स से कह‌ता हूँ कि ऐ अयाज़ तेरी यह तमाम नेमतें, इज़्ज़त व शानो शोकत सब सुल्तान महमूद की दी हुयी हैं वरना ऐ अयाज़ तेरी हकीकत एक दिन यही गुदड़ी और बोसीदा पोस्तीन थी।

इस वाकिये से मुतास्सिर होकर मौलाना बतौर इबरत व नसीहत फरमाते हैं कि ऐ लोगो तुम्हारी हकीकत भी एक गन्दा पानी जो कपड़ों पर लग जाये तो कपड़ा धोना ज़रूरी हो जाये, के जलील कतरे की सी है। फिर जिस ज़ात ए पाक ने अपनी कुदरत से और अपनी अताए कामिल से इस गन्दे कतरे को इन्सानियत और आद‌मियत की पोशाक इनायत फरमाई व बख़्शी है। आज उसी जाते पाक के मुकाबले में खुदाई का दावा करते हो।

मौलाना फरमाते हैं कि अयाज़ की तरह एक दिन शुरू में वो दिन बीते हुए हैं कि तेरी गुदड़ी बाप का एक कतरा नजिस पानी का यानी नुतफ़ा था और तेरी पोसतीन बोसीदा माँ का खून यानी हेज़ था। बाकी आज तू जिस खूबसूरत शक्ल व सूरत में नज़र आता है यह तेरे बातनी न जाहिरी आज़ा (जिस्म के हिस्से) और उन‌की अनमोल ताकतें सबक खुदा तआला की अता की हुई हैं। इनसान के यह सारे उलू‌मो फुनून किस काम के जब इन्सान अपनी हकीकत को भी ना जान सके, और अपने पैदा करने वाले को ना पहचान सके।

मौलाना आरिफ रूमी रह. अ. फ़रमाते हैं कि सैंकड़ों उलूमो-फुनून उसने हासिल किये लेकिन यह ज़ालिम खुद अपनी जान से बेखबर रहा, तमाम उलूम की रूह सिर्फ यह है कि आद‌मी यह जान ले कि कल क्‌यामत के दिन अल्लाह तआला के सामने हमारी क्या कीमत होगी। अगर इन्सान अपनी पैदाइश पर गौर करता रहे और अपनी इब्तेदायी गुद‌ड़ी और पोसतीन पर नज़र रहे, तो नाज़ व तकब्बुर पास नहीं आ सकता और अपने अल्लाह को पहचान लेगा, यानी जब सोचेगा कि हम हकीर शै से पैदा किये गये है तो अपने नाज़ व तकब्बुर से खुद ही शर्मा जाएगा।

कुरआन ए हकीम में है कि और खुद तुम्हारी जात में मेरी (यानी अल्लाह की निशानियां मौजूद हैं सो क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता” अपने वजूद को लिये हुये हर वक्त चलते फिरते रहते हो, आखिर तुम कहां से सुनते हो, यह तमाम कारखाने किस के बनाये हुये हैं। हक ताला हम सब को अपनी तखलीक पर और अल्लाह तआला की बनायी हर मखलुक पर गौर करने की समझ अता फरमाये। आमीन

हबीबुल्ला एडवोकेट, जवाहरनगर, जयपुर

(माखूज किताब मारेफत इलाहीया)

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