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दूसरों का एहतराम करना

Jaipur

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हर इंसान ये जानता है कि जब लोग तालीमयाफ्ता, मोहज़्ज़ब, और पुरसुकून ज़िंदगी जीते हैं, तो ये अल्लाह का बड़ा करम होता है और इसके लिए उसका शुक्र अदा करना चाहिए। मगर ये भी याद रखना ज़रूरी है कि ज़ुल्म, नाइंसाफी और बेरुख़ी जैसी बातें आज भी हमारे समाज में किसी छुपे हुए वायरस की तरह मौजूद हैं। इन्हें रोकने के लिए हमें जागरूक रहना होगा, ताकि हमारा समाज बुराई और ताशद्दुद (हिंसा) से बचा रहे। अल्लाह तआला ने हमें एक बहुत ही प्यारी बात सिखाई है। कुरआन में है: “और लोगों से अच्छी बात कहो…” (सूरह बकरह 2:83)। इसका मतलब ये है कि जब भी किसी से बात करो, तो नरमी, मोहब्बत और अदब से बात करो। उन्हें ऐसे मशवरे दो जो उनके लिए फायदेमंद हों। जैसे-जैसे लोग ज़्यादा मोहज़्ज़ब होते जाते हैं, वैसे-वैसे वो एक-दूसरे से ज़्यादा इज़्ज़त और नरमी की उम्मीद करते हैं। इसलिए हमें चाहिए कि जो लफ़्ज़ हम बोलें, जो रवैया अपनाएं, वो दूसरों के दिल को ठेस न पहुँचाए। एक सुनहरी उसूल है “जिस तरह हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ पेश आएं, वैसे ही हमें भी दूसरों से पेश आना चाहिए।” अगर हम इस उसूल पर अमल करें, तो बहुत सी समाजी परेशानियाँ खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “तुम में से कोई सच्चा मोमिन नहीं हो सकता, जब तक कि वह अपने भाई के लिए वही न चाहे, जो अपने लिए चाहता है।”

हर इंसान की एक अंदरूनी चाहत होती है कि कोई उसे माने, उसकी तारीफ़ करे, उसकी क़द्र करे और उसकी परवाह करे। एक मशहूर कहावत है: “हर इंसान के माथे पर लिखा है – मुझे तवज्जो दो और मुझे नज़रअंदाज़ मत करो।”

दूसरों का एहतराम करने के कुछ तरीके ये हैं:
जिससे मिलो उसे सलाम करो, मुस्कुराकर बात करो, हाल-चाल पूछो, अगर गलती हो जाए तो माफ़ी माँगो, तकलीफ में मदद के लिए आगे आओ, अच्छे काम की तारीफ करो वगैरह।

मेरे प्यारे बेटों और बेटियों, घमंड से बचो। कभी भी किसी को छोटा मत समझो, किसी को नज़रअंदाज़ मत करो। एक कहावत है:

घमंडी इंसान उस शख्स की तरह होता है
जो पहाड़ की चोटी पर खड़ा हो
वो लोगों को छोटा देखता है,
और लोग भी उसे छोटा ही देखते हैं।

घमंड से लोग एक-दूसरे से नफ़रत करने लगते हैं। लेकिन हमारा मज़हब हमें सिखाता है कि हम एक-दूसरे की इज़्ज़त करें और एक-दूसरे की फिक्र करें। हमें खुद अपने अंदर भी एहतराम का जज़्बा पैदा करना चाहिए, तभी हम दूसरों की क़द्र करना सीख पाएंगे। हमें सबसे पहले अपने वालिदैन, उस्ताद, बुज़ुर्ग, नेक और खिदमत करने वाले लोगों की इज़्ज़त करनी चाहिए। पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: “वो हम में से नहीं, जो हमारे बुज़ुर्गों की इज़्ज़त नहीं करता, हमारे छोटों पर रहम नहीं करता और हमारे आलिमों (विद्वानों) का मर्तबा नहीं पहचानता।” एक और हदीस में है: “अल्लाह की ताज़ीम का हिस्सा है कि बुज़ुर्ग मुसलमान की, हाफिज़-ए-कुरआन की (जो सही पढ़े और याद रखे), और इंसाफ़ करने वाले हाकिम की इज़्ज़त की जाए।”

  1. जो शख्स चाहता है कि लोग उसकी इज़्ज़त करें, उसे भी सबके साथ अच्छे अख़लाक और बरताव से पेश आना चाहिए। एक शरीफ़ और नेकी पसंद इंसान सबके साथ बराबरी, सब्र और समझदारी से पेश आता है। ऐसा इंसान सबका चहेता बन जाता है।
  2. लोगों की इज़्ज़त का मतलब है कि हम उनकी मेहनत, उनके फैसले और उनकी पसंद को भी माने, जब तक वो शरीअत के खिलाफ न हो।
  3. जब भी बात करो, ऐसे लफ़्ज़ इस्तेमाल करो जो तुम्हारी अच्छी परवरिश और तहज़ीब को दिखाएं। गंदे और नीच शब्दों से हमेशा दूर रहो।
  4. किसी को तंग न करो, बुरा बर्ताव न करो। अच्छा अख़लाक अपनाओ और इस सिलसिले में कुछ अच्छी किताबें पढ़ो ताकि तुम्हारी शख्सियत और बेहतर हो सके।

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