शाह नवाज़ खान:
आज़ाद हिंद फौज के जनरल से गांधीवादी नेता तक का सफर (1914–1983)
लाल किले के मुकदमे के नायक और मेरठ के लोकप्रिय सांसद
नई दिल्ली/मेरठ (रॉयल पत्रिका)। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मेजर जनरल शाह नवाज़ खान का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। वे एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने पहले ब्रिटिश सेना में सेवा दी, लेकिन बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रभावित होकर आज़ाद हिंद फौज (INA) के माध्यम से देश की आज़ादी के लिए बिगुल फूंका।
24 जनवरी 1914 को माटोर (अब पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में) के एक जनजुआ राजपूत परिवार में जन्मे शाह नवाज़ खान का जीवन साहस और बलिदान की मिसाल है।
प्रारंभिक जीवन और INA का सफर
उनके पिता लेफ्टिनेंट टिक्का खान भी सेना में थे। शाह नवाज़ ने अपनी शिक्षा ‘प्रिंस ऑफ वेल्स रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज’ से प्राप्त की और उन्हें 14वीं पंजाब रेजिमेंट में कमीशन मिला।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, वे सुभाष चंद्र बोस के उन भाषणों से अत्यधिक प्रभावित हुए, जिनमें उन्होंने युद्धबंदियों से स्वतंत्र भारत के लिए लड़ने का आह्वान किया था।
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1943: वे INA में शामिल हुए।
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अंतरिम सरकार: उन्हें बोस द्वारा गठित स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया।
लाल किले का ऐतिहासिक मुकदमा (Red Fort Trial)
शाह नवाज़ खान को जनरल प्रेम सहगल और कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों के साथ दिल्ली के लाल किले में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा “सम्राट के विरुद्ध युद्ध छेड़ने” के आरोप में मुकदमे का सामना करना पड़ा।
इनका बचाव पंडित जवाहरलाल नेहरू, भूलाभाई देसाई और कैलाश नाथ काटजू जैसे दिग्गजों ने किया। दलील दी गई कि वे भाड़े के सैनिक नहीं, बल्कि एक वैध सरकार (आज़ाद हिंद सरकार) के सिपाही थे।
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अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी।
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लेकिन भारी जनदबाव के कारण भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ को यह सजा रद्द करनी पड़ी।
गांधीजी का प्रभाव और राजनीतिक करियर
मुकदमे के बाद, खान ने महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग को अपनाया। 1946 में वे गांधीजी और अब्दुल गफ्फार खान के साथ नोआखली दंगा पीड़ितों की मदद के लिए भी गए।
मेरठ से गहरा रिश्ता: आज़ादी के बाद शाह नवाज़ खान ने मेरठ को अपनी कर्मभूमि बनाया।
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वे 1952, 1957, 1962 और 1971 में मेरठ से चार बार लोकसभा सांसद चुने गए।
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1967 (जनसंघ) और 1977 (जनता लहर) में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
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उनका परिवार पाकिस्तान में रहा, लेकिन उन्होंने अपने एक बेटे के साथ भारत में ही रहना चुना।
नेताजी की मृत्यु की जांच
1956 में सरकार ने सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच के लिए शाह नवाज़ खान की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति ने निष्कर्ष निकाला कि बोस की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (ताइवान) में विमान दुर्घटना में हुई थी।
सिनेमा और विरासत
9 दिसंबर 1983 को उनका निधन हुआ। उन्हें लाल किले और जामा मस्जिद के पास पूरे राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया। वे अंतिम समय तक कांग्रेस सेवा दल के प्रमुख रहे।
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फिल्में: 2005 की फिल्म ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस: द फॉरगॉटन हीरो’ में उनका किरदार सोनू सूद ने और 2017 की फिल्म ‘रागदेश’ में कुणाल कपूर ने निभाया।
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