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डॉ. जाकिर हुसैन: भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति की जयंती पर विशेष विवरण

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भारत के इतिहास में अबतक 15 राष्ट्रपति हो चुके हैं। आपको देश के पहले और मौजूदा राष्ट्रपति के नाम तो याद होंगे लेकिन इस लिस्ट के नामों को याद करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे तो वहीं मौजूदा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि देश के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन थे और उनकी जयंती 8 फरवरी को मनाई जाती है। भारत के इतिहास में डॉ. जाकिर हुसैन का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे न केवल भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे, बल्कि भारतीय शिक्षा और समाज सुधार में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका जीवन हमें शिक्षा, समानता और समर्पण का संदेश देता है।

शुरुआती जीवन:

डॉ. जाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी 1897 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज में हुआ था। वे एक पश्तून मुस्लिम परिवार से थे और आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। उनका बचपन कठिनाइयों से भरा था। जब वे 10 वर्ष के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया और इसके बाद उनकी मां उन्हें लेकर उत्तर प्रदेश के इटावा शहर में आ गईं। इटावा में रहकर जाकिर हुसैन ने इस्लामिया हाई स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की। 14 साल की उम्र में उनकी मां की भी मृत्यु हो गई, जिससे उनका जीवन और भी कठिन हो गया। बावजूद इसके, जाकिर ने अपनी पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी और उन्हें शिक्षा के प्रति गहरी रुचि थी।

शिक्षा और करियर:

जाकिर हुसैन ने अपनी उच्च शिक्षा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्राप्त की, जो उस समय एंग्लो-मुहम्मदन ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना जाता था। कॉलेज के दिनों में ही वे छात्र संघ के अध्यक्ष बन गए थे और जल्द ही पूरे देश में उनकी लोकप्रियता बढ़ गई। अपने कॉलेज के दिनों में ही जाकिर हुसैन ने एक युवा समूह का नेतृत्व किया, जिससे 1920 में अलीगढ़ में नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना की। 1925 में यह यूनिवर्सिटी नई दिल्ली के करोल बाग में स्थानांतरित हो गई, और 1930 में इसे जामिया मिलिया इस्लामिया के रूप में पुनः स्थापित किया गया। आज यह विश्वविद्यालय देश के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में से एक है।

राजनीतिक यात्रा:

भारत की स्वतंत्रता संग्राम में भी डॉ. जाकिर हुसैन का अहम योगदान था। उन्हें 1957 में बिहार का गवर्नर बनाया गया और फिर 1962 में भारत के उपराष्ट्रपति के पद पर नियुक्त किया गया। 1967 में, उपराष्ट्रपति के रूप में उनका कार्यकाल समाप्त होने पर, इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत का राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि, इसको लेकर कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज और इंदिरा गांधी के बीच थोड़ी खींचतान हुई, क्योंकि कामराज चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन को पुनः राष्ट्रपति चुना जाए। लेकिन इंदिरा गांधी ने डॉ. जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बना दिया, और वे 13 मई 1967 को भारत के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने वाले थे।

राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल:

डॉ. जाकिर हुसैन ने 13 मई 1967 से 3 मई 1969 तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया। राष्ट्रपति बनने के बाद वे गंभीर शारीरिक समस्याओं का सामना कर रहे थे, और उनका स्वास्थ्य दिन-ब-दिन बिगड़ता गया। उनकी शुगर और ग्लूकोमा के कारण उनकी आंखों की रोशनी भी कमजोर हो गई थी। फिर भी वे अपने कर्तव्यों को पूरी निष्ठा से निभाते रहे। डॉ. जाकिर हुसैन राष्ट्रपति पद पर रहते हुए निधन होने वाले पहले व्यक्ति थे। 3 मई 1969 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद, राष्ट्रपति भवन के बाहर लाखों लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए जुटे थे, और यह एक ऐतिहासिक घटना बन गई।

शैक्षिक योगदान और जामिया मिलिया इस्लामिया:

डॉ. जाकिर हुसैन को शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए याद किया जाता है। उनका मानना था कि शिक्षा समाज के स्तर को ऊपर उठाने का सबसे शक्तिशाली साधन है। उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, जिसे उन्होंने स्थापित किया, आज भारतीय उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

पद्म विभूषण और सम्मान:

उनकी मृत्यु के बाद, भारत सरकार ने उन्हें 1983 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया, जो भारतीय नागरिकों के लिए दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। डॉ. जाकिर हुसैन का जीवन शिक्षा, समानता, और समाज सेवा के प्रतीक के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने भारतीय समाज में एकता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रयास किए। उनका योगदान हमेशा भारतीय राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में अमिट रहेगा। उनकी जयंती पर हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं।

 

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