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भारत छोड़ो आंदोलन 

Jaipur

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भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत 8 अगस्त 1942 को गांधी जी के मुंबई में दिए गए भारत छोड़ो अभिभाषण व “करो या मरो” के नारे से हुई थी। अभिभाषण में उन्होंने सीधे-सीधे अंग्रेजों से ब्रिटिश शासन के अंत की मांग की थी, और आम नागरिक से इसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी की अपील की। भारत छोड़ो शब्द का प्रयोग पहली बार मुंबई के मेयर युसूफ महरौली ने किया था। यह द्वितीय विश्व युद्ध का समय था, ब्रिटिश सरकार ने तुरंत स्वतंत्रता देने से इंकार कर दिया वह द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद ही इस पर कोई विचार विमर्श के लिए सहमत हुए लेकिन बाद में वह भारत छोड़ो आंदोलन को बल प्रयोग से दबाने लगे, इससे आमजन वह स्वतंत्रता आंदोलनकारियों में भीषण रोष पैदा हो गया, जिससे उन्होंने सरकारी संस्थानों पर जमकर प्रहार करना शुरू कर दिया। 550 डाकघर, 250 रेलवे स्टेशन एवं रेल लाइनें, 70 पुलिस स्टेशन, 85 सरकारी इमारतें, 2500 दूरभाष लाइनें और ना जाने कितनी क्षति स्वतंत्रता आंदोलनकारियों द्वारा ब्रिटिश हुकूमत को पहुंचाई गई। बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डाला गया सबसे ज्यादा आक्रमण बिहार राज्य में देखने को मिले, ब्रिटिश हुकूमत ने 57 बटालियन ब्रिटिश सेना को भारत छोड़ो आंदोलन को दबाने में लगा दिया। लेकिन यह आंदोलन कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था सभी जाति, वर्ग, धर्म, महिला, पुरुष, बूढ़े, नौजवानों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ब्रिटिश सरकार इससे घबरा गई और उन्होंने विचार करना शुरू कर दिया कि अगले कुछ वर्षों में कैसे सम्मान वह शांतिपूर्वक भारत छोड़कर जाया जा सकता है, और भारत को स्वतंत्रता कैसे और किस प्रकार दी जा सकती है। भारत छोड़ो आंदोलन में सभी वर्गों जैसे किसान, व्यापारी, छात्र, महिलाएं आदि के विभिन्न संघठनो में देशभक्ति व देश को आजाद कराने की एक लहर पैदा कर दी थी। स्वतंत्रता सेनानियों ने स्थानीय स्तर पर एक समानांतर सरकार का भी गठन कर लिया था। इसी बीच 1943 में भीषण अकाल पड़ा। आम भारतीयों को खाने के लाले पड़ गए, फिर गांधी जी की अपील पर भारत छोड़ो आंदोलन वापस ले लिया गया। लेकिन अंदरूनी तौर पर भारत छोड़ो आंदोलन कभी खत्म नहीं हुआ बल्कि राम मनोहर लोहिया, जे पी नारायण, अरूणा आसफ अली, बीजू पटनायक, सुचेता कृपलानी और ऐसे ही अन्य कितने स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत छोड़ो आंदोलन को भारतीय जनमानस में जगाए रखा इस वजह से अंग्रेजों में यह बात घर कर गई कि अब भारत में और बने रहना नामुमकिन है साथ में नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंडियन नेशनल आर्मी एवं आजाद हिंद फौज की कार्यवाही की वजह से भी अंग्रेजी हुकूमत मुश्किल में थी। इन सभी वजह से अंग्रेजी हुकूमत भारत को स्वतंत्र करने पर गंभीरता पूर्वक विचार करने लगी, और अंततः हमारा देश भारत 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजाद हुआ।

 

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