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मिशन आगमन: भारत का पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-1’ की सफल लॉन्चिंग, श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष में भरी उड़ान

मिशन आगमन: भारत का पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-1’ की सफल लॉन्चिंग, श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष में भरी उड़ान

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India first private orbital rocket : हैदराबाद। भारत की निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। कंपनी का विक्रम-1 (Vikram-1) रॉकेट श्रीहरिकोटा (Sriharikota Range) के सतीश धवन स्पेस सेंटर (Satish Dhawan Space Centre) से सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया। यह लॉन्चिंग आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से दोपहर 12:05 बजे की गई। पहले यह लॉन्चिंग 11:30 बजे होनी थी, लेकिन लॉन्च से 5 मिनट पहले काउंटडाउन रोक दिया गया। कुछ देर के होल्ड का बाद इसे दोबारा शुरू किया गया। यह भारत की निजी क्षेत्र की पहली ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्चिंग में से एक है, जिसने पूरे देश को गर्व का मौका दिया है। इसरो के वैज्ञानिकों ने लॉन्च की पूरी प्रक्रिया को मॉनिटर किया। इस मिशन का नाम ‘आगमन’ (Mission Aagaman) रखा गया है। इसके तहत विक्रम-1 रॉकेट अपने साथ टेक्नोलॉजी से लेकर कला से जुड़े पेलोड्स अंतरिक्ष में भेजे गए हैं।

यह लॉन्च सिर्फ स्काईरूट के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के पूरे प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए भी बड़ा मौका है। साल 2020 में सरकार ने स्पेस सेक्टर में बड़े बदलाव किए थे। इसके बाद निजी कंपनियों को भी रॉकेट, सैटेलाइट और लॉन्च सर्विस पर काम करने की अनुमति मिली। वही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को भारत के पहले निजी तौर पर विकसित प्रक्षेपण यान विक्रम-1 के पहले कक्षीय प्रक्षेपण की सराहना की। उन्होंने इसे देश की अंतरिक्ष यात्रा में एक ‘ऐतिहासिक नई सीमा’ और भारत के युवाओं की प्रतिभा और उद्यमशीलता की भावना का प्रतिबिंब बताया।

क्या है मिशन आगमन, जानें इसकी खासियत

मिशन आगमन विक्रम-1 रॉकेट की पहली परीक्षण उड़ान है। इस मिशन के जरिए स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पूरी तरह स्वदेशी विकसित ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल की क्षमताओं का परीक्षण करेगी।

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विक्रम-1 रॉकेट का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक, डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है।

विक्रम-1 एक 24 मीटर लंबा ऑर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए तैयार किया गया है।

यह पूरी तरह हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से बना है, जिससे इसका वजन कम और क्षमता अधिक हो जाती है।

कंपनी के अनुसार कार्बन फाइबर सबसे मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट अधिक दक्ष बनता है।

रॉकेट में तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं, जबकि सबसे ऊपर एक ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है।

यही मॉड्यूल एक ही मिशन में कई उपग्रहों को अलग-अलग कक्षाओं में स्थापित करने में मदद करेगा।

विक्रम-1 को 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है।

इतना अहम क्यों है यह मिशन ?

अब तक भारत में कक्षा में उपग्रह भेजने का काम मुख्य रूप से इसरो के रॉकेटों के जरिए होता रहा है। अगर विक्रम-1 सफल होता है तो भारत की निजी कंपनियां भी स्वतंत्र रूप से व्यावसायिक लॉन्च सेवाएं देने में सक्षम होंगी। आईएन-स्पेस के तकनीकी निदेशक राजेश जोथी के अनुसार यह मिशन छोटे उपग्रहों और छोटे लॉन्च व्हीकल के वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को मजबूत कर सकता है। उनका कहना है कि वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।

18 कैरेट सोने से बना आर्ट पीस भी स्पेस में भेजा गया

मिशन आगमन में कई पेलोड भेजे जाएंगे। इनमें बंगलूरू की कंपनी कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित लैब में तैयार किया गया डायमंड लोटस भी शामिल है। साथ ही अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी विक्रम-1 मिशन के साथ अंतरिक्ष में भेजी गई। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार इतना छोटा है कि वे चावल के एक दाने से भी छोटी हैं। इसके अलावा इस मिशन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित पोस्टकार्ड भी अंतरिक्ष में भेजी गई है, जिस पर वंदे मातरम लिखा है। स्काईरूट के अनुसार इसके साथ कंपनी की टीम, निवेशकों, नीति-निर्माताओं और दुनिया भर के शुभचिंतकों के हस्तलिखित संदेश भी भेजे गए है।

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