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परिवारवाद के कारण राजनीतिक र्पाटियों को उपचुनाव में नुकसान

jaipur

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जयपुर(रॉयल पत्रिका)। परिवारवाद की राजनीतिक करने वाले नेताओं ने राजस्थान के उप विधानसभा चुनाव में अपनी अपनी पार्टियों को नुकसान पहुंचाया है। जनता ने परिवारवाद की राजनीति करने वालों को सिरे से नकार दिया। राजस्थान विधानसभा उपचुनाव में पांच उम्मीदवारों को राजनीतिक पार्टियों ने टिकट दिया था। जिनमें से दो भाजपा दो कांग्रेस और एक आरएलपी के उम्मीदवार थे। जनता ने पांच में से चार उम्मीदवारों को हरा दिया। इनकी हार से परिवारवाद की राजनीति करने वाले नेताओं को सबक लेना चाहिए। परिवारवाद की राजनीति करने वाले यह नेता पार्टियों और जनता दोनों को ही ब्लैकमेल करते दिखाई देते हैं। झुंझुनू में बृजेंद्र ओला ने जो सांसद हैं उनके बेटे को कांग्रेस ने टिकट दिया था। सांसद बृजेंद्र ओला की जिद के कारण कांग्रेस पार्टी को अमित ओला को टिकट देना पड़ा था। जबकि उनके टिकट का वहां के क्षेत्रीय नेताओं ने विरोध किया था। इसी तरह राजस्थान में मीणा समाज के बड़े नेता डॉ. किरोडीलाल मीणा की सिफारिश पर भाजपा ने दौसा से टिकट दिया लेकिन जनता ने डॉ. किरोडीलाल मीणा के भाई जगमोहन मीणा को हरा दिया। भाई की हार से डॉ. किरोडी लाल की राजनीति कमजोर हो सकती है। इसी तरह हनुमान बेनीवाल जो जाटों के कद्दावर नेता माने जाते हैं। खींवसर उपचुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी कनिका बेनीवाल को उम्मीदवार बनाया लेकिन भाजपा के हाथों हारना पड़ा। जनता में और जाट समाज में लोकप्रिय होने के बावजूद बेनीवाल परिवारवाद से नहीं उभर पाए। अलवर के रामगढ़ सीट पर पांच बार विधायक रहे स्वर्गीय की जूबेर खान के पुत्र आर्यन खान को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया लेकिन उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ा। यदि इन सीटों पर पार्टियां दूसरे कार्यकर्ताओं को उम्मीदवार बनाती हैं तो उनके जीतने की संभावना बढ़ जाती है। एक मात्र उम्मीदवार सलूंबर से शांतादेवी को भाजपा ने टिकट दिया, वह मामूली अंतर से चुनाव जीत गई। परिवारवाद करने वाले नेता राजनीतिक पार्टियों को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस पार्टी एवं क्षेत्रीय पार्टियों परिवारवाद के चलते बार-बार चुनाव हार रही हैं फिर भी सबक सिखाने को तैयार नहीं हैं।

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