इस्लाम में माँ-बाप का मुक़द्दस मक़ाम
आज की दुनिया में इंसान तेज़ी से खुदगर्ज़ बनता जा रहा है। हर कोई अपने लिए सोचता है, अपने लिए दौड़ता है, और बहुत बार इस भागदौड़ में वो अपने सबसे अज़ीज़ रिश्तों को भूल जाता है, माँ-बाप को। लेकिन इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जो इंसान को सिखाता है कि सबसे पहले उन लोगों की कद्र करो जिन्होंने तुम्हें दुनिया में लाने का ज़रिया बनाया यानी तुम्हारे माँ-बाप।
कुरान की रौशनी में माँ-बाप का दर्जा
कुरान पाक में अल्लाह तआला फरमाता है:
“तुम्हारे रब ने हुक्म दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत ना करो और माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करो। अगर उनमें से कोई एक या दोनों बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उनको ‘उफ़’ तक ना कहो और ना ही उन्हें झिड़को, बल्कि उनसे नरमी से बात करो।”: (सूरह बनी इस्राईल 17:23). ये आयत हमें बताती है कि माँ-बाप के साथ कैसा सुलूक करना चाहिए चाहे वो बुढ़ापे में हों या जवान, हमें उनसे नर्मी से पेश आना चाहिए।
हदीसों में माँ-बाप का ज़िक्र
पैगंबर हज़रत मुहम्मद ने फरमाया: “जन्नत माँ के कदमों के नीचे है।” (मुस्लिम)
इसका मतलब ये है कि अगर इंसान अपनी माँ की खिदमत करता है, उसकी इज़्ज़त करता है, तो जन्नत उसका इनाम हो सकती है।एक और हदीस में आया है: “जिसने अपने माँ-बाप में से किसी एक को या दोनों को बुज़ुर्गी की उम्र में पाया और फिर भी (उनकी खिदमत करके) जन्नत हासिल ना कर सका, तो उस पर अफ़सोस है।”यहाँ साफ़ कहा गया है कि माँ-बाप की खिदमत करने का मौका मिलना एक नेमत है और अगर इंसान इसे गँवा दे, तो उस से ज़्यादा बदनसीब कोई नहीं।
माँ-बाप का हमारे जीवन में किरदार
माँ-बाप ही वो लोग होते हैं जो हमारी परवरिश करते हैं। जब हम कुछ नहीं जानते, न चलना आता है, न बोलना वही हमें हर चीज़ सिखाते हैं। माँ हमें दूध पिलाती है, बुख़ार में रात-रात जागती है, और बाप धूप में मेहनत करके हमें रोटी खिलाता है। क्या ऐसे लोगों को भूल जाना इंसानियत है?
माँ-बाप की दुआ और अहमियत
कहते हैं कि माँ-बाप की दुआओं में बहुत ताक़त होती है। वो दिल से दुआ देते हैं, और अल्लाह उनकी दुआओं को जल्दी कबूल करता है। एक बाप की खामोश मेहनत और एक माँ की ममता, बच्चे की तरक्की की नींव होती है।
आज का दौर और माँ-बाप की अहमियत
आजकल की दुनिया में सोशल मीडिया, वीडियो गेम्स और भागदौड़ ने बच्चों को माँ-बाप से दूर कर दिया है। बच्चे मोबाइल में मशगूल रहते हैं, और माँ-बाप तन्हा रह जाते हैं। कई बुज़ुर्ग माँ-बाप तो ऐसे भी हैं जिनकी देखभाल कोई नहीं करता। उन्हें ओल्ड एज होम में छोड़ दिया जाता है ये अफ़सोसनाक सूरत-ए-हाल है। इस्लाम इस रवैये को सख़्त नापसंद करता है। इस्लाम कहता है कि जैसे तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हारी परवरिश की, वैसे ही तुम उनके बुढ़ापे में उनकी सेवा करो।
माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करें
नर्मी से बात करें, कभी ऊँची आवाज़ में ना बोलें।
वक़्त दें, मोबाइल से ज़्यादा ज़रूरी उनके साथ बैठना है।
दुआ करें, हमेशा उनकी सलामती की दुआ माँगें।
उनकी खिदमत करें, उनके लिए खाना बनाना, दवाई देना, साथ बैठना ये सब इबादत का दर्जा रखता है।
शुक्रगुज़ार बनें, हमेशा एहसानमंद रहें कि उन्होंने आपको इतनी मेहनत से बड़ा किया।
बच्चों को सिखाएँ माँ-बाप की अहमियत
अगर आप माँ-बाप हैं, तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप अपने बच्चों को बचपन से ही माँ-बाप की इज़्ज़त करना सिखाएँ।
कहानियाँ सुनाएँ, पैग़म्बरों और नेक लोगों की कहानियाँ जिनमें माँ-बाप की खिदमत का ज़िक्र हो।
खुद मिसाल बनें, जैसा आप अपने माँ-बाप से पेश आते हैं, बच्चा वो देखकर सीखता है।
धैर्य रखें, बच्चों को समझाना वक़्त लेता है, लेकिन मेहनत ज़रूर रंग लाती है।
इस्लाम में माँ-बाप का मुक़ाम बहुत ऊँचा है। उनके लिए की गई छोटी-सी खिदमत भी अल्लाह की नज़र में बहुत बड़ा अमल है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी ज़िंदगी में बरकत हो, दिलों में सुकून हो और जन्नत हासिल हो तो हमें अपने माँ-बाप की इज़्ज़त, सेवा और दुआओं की क़द्र करनी चाहिए।आइए हम सब अपने माँ-बाप को वही मुहब्बत और एहतराम दें जो वो हमारे लिए रखते हैं।
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