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कायमखानी कौम की उत्पत्ति कैसे हुई

Jaipur

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14 जून नवाब कायम खां का शहादत दिवस…   

एम. ताहिर खान

कायमखानी कौम का इतिहास मुख्य रूप से राजस्थान और हरियाणा के क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। मान्यता अनुसार दुनिया में मौजूद तमामतर इंसानों की उत्पत्ति पहले इंसान हजरत आदम अलैहिस्सलाम से हुई है। इनके बाद उनकी औलाद में ‘साम’ नाम से एक शख्स हुए हैं। इन्हीं के कबीले से आगे चलकर ‘चौहान’ नामी योद्धा कौम या कबीले की उत्पत्ति हई। इसी चौहान राजपूत कौम से ‘कायमखानी’ कौम की उत्पत्ति हुई। कायमखानी कौम के आदिपुरुष नवाब कायम खां साहब हुए हैं। ‘कायम खान रासो’ के लेखक कवि जान उर्फ न्यामत अली खान  ने हजरत आदम अलैहिस्सलाम से नवाब कायम खां तक का संपूर्ण शिजरा अपनी कलम से लिखा है। जो कायम खां रासो में आज भी मौजूद है। इस संदर्भ में इकरा पत्रिका के संपादक एम. फारुक खान द्वारा लिखी पुस्तक ‘कायम खानी नवाबों की वंशावली’ जिसका प्रथम संस्करण 2014 में प्रकाशित हुआ था जिसमें भी यही हवाला लिखा हुआ है। यह किताब हिंदी और उर्दू दो भाषाओं में प्रकाशित हुई थी। चौहान वंश में कई शाखाएं हुई हैं, जिनमें शाकम्बरी चौहान शाखा प्रसिद्ध है। शाकम्बरी चौहान इन्हे शाकम्बरी माता जी की वजह से बोलते हैं, जो इस शाखा के चौहानों की कुलदेवी है। चौहानों की यह शाखा राजस्थान की सांभर झील के आसपास के इलाके पर शासन करती थी। कालांतर में इनसे अलग होकर कुछ चौहानों ने अजमेर में जाकर अपना राज्य स्थापित किया। जिसमे बहादुरी और कूटनीतिज्ञ से परिपूर्ण कई शासक हुए हैं। जिनमें प्रमुख रूप से विग्रह राज जी, पृथ्वीराज चौहान जी तृतीय आदि हुए हैं। इसी शाकम्बरी शाखा से संबंधित चौहान राजा घंघराय ने चूरू के आस-पास घाँघु और ददरेवा क्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किया। सीकर का हर्ष पर्वत राजा घंघराय के पुत्र हर्ष के नाम पर है। जीण माता भी राजा घंघराय राय की पुत्री बताई जाती है। राजा घंघराय की औलाद में आगे चलकर गोगाजी चौहान एक प्रसिद्ध शासक हुए हैं। जो राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता में से एक हैं जिन्हें जाहर पीर (प्रकट देवता) कहा जाता है। गोगाजी का मकबरानुमा स्थल ‘गोगामेड़ी’ राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में नोहर के पास स्थित है। जहां कायमखानी भी भारी संख्या में जाते हैं।  इस मकबरेनुमा  संरचना को ‘मेड़ी’ कहते हैं जिसके ऊपर बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है। इसे सर्वप्रथम नवाब कायम खान साहब की इच्छा पर उनकी देखरेख में सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने बनवाया था। गोगाजी चौहान के वंश में आगे चलकर मोटे राव जी चौहान ददरेवा के शासक हुए हैं। मोटे राव जी चौहान के 6 बेटे थे जिनमें बड़े बेटे जैन सिंह उर्फ जसवंत सिंह जी हुए हैं। दूसरे बेटे कर्म सिंह जी हुए हैं, तीसरे बेटे जबर सिंह जी, चौथे बेटे जगमाल सिंह जी, पांचवें बेटे जयराज जी और छठे बेटे भोजराज जी हुए हैं। कर्म सिंह की पैदाइश 1335 ईस्वी में हुई थी। कायम खां रासो के अनुसार ‘कर्म सिंह जी शिकार खेलने के लिए गए थे जब थक गए तो एक पेड़ के नीचे आराम करने लग गए थे। उसी शिकारगाह में दिल्ली सुल्तान फिरोजशाह तुगलक और हिसार के गवर्नर सैयद नासिर अपने सिपाहियों के साथ शिकार खेल रहे थे। तब फिरोजशाह तुगलक की उस नौजवान पर नजर पड़ी जो पेड़ के नीचे आराम कर रहा था। फिरोजशाह तुगलक और सैयद नासिर दोनों ने अपनी आंखों से वह रूहानी कारनामा देखा जहां सभी पेड़ों की छाया ढल चुकी थी, लेकिन जिस पेड़ के नीचे नौजवान कर्म सिंह जी आराम कर रहे थे। उस पेड़ की छाया उसी तरह बरकरार थी। यह देखकर फिरोजशाह तुगलक ने कर्म सिंह जी का नाम पूछा और उन्हें अपने साथ हिसार ले गए।’ कर्म सिंह जी ने सैयद नासिर साहब की देखरेख में तथा हांसी पीर साहब तीसरे कुतुब साहब के यहाँ रहकर रूहानी तालीम के साथ-साथ युद्ध कौशल का इल्म सीखा। कुंवर कर्म सिंह जी ने इस्लाम से प्रभावित होकर 1357 ईस्वी में इस्लाम कबूल किया। उनके साथ बड़े भाई जैन सिंह उर्फ जसवंत सिंह जी और छोटे भाई जबर सिंह जी ने भी इस्लाम कबूल किया। तीनों भाइयों ने पिता मोटे राव जी चौहान की अनुमति से हांसी पीर साहब तीसरे कुतुब के हाथ पर बैत करके इस्लाम कबूल किया। इस्लाम कबूल करके जैन सिंह जी जैनुद्दीन खां, कर्म सिंह जी कायम खां और जबर सिंह जी जबरूद्दीन खां के नाम से जाने गए। कायम खां के नाम से तीनों भाइयों की औलाद कायमखानी कहलाई। कायमखानी कौम की स्थापना के बाद से लेकर आज तक इस कौम को बहादुर, जांबाज, वफादार और वतन से मोहब्बत करने वाली कौम के नाम से जाना जाता है। सैयद नासिर साहब ने अपने इंतकाल से पहले कायम खां साहब को अपनी जागीर हिसार वसीयत कर दी। कायम खां साहब हिसार के गवर्नर बने और ‘नवाब कायम खां के नाम से इतिहास में जाने गए। नवाब जैनुद्दीन खां साहब को नारनौल की जागीर मिली तथा नवाब जबरुद्दीन खां साहब को चरखी दादरी के इलाके सौंप दिए गए। नवाब कायम खां साहब को दिल्ली सल्तनत का वजीर और सेनापति भी बनाया गया था। सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के बाद तुगलक वंश के कई शासक हुए इन सभी का शासन नवाब कायम खां साहब ने देखा है। आक्रमणकारी तैमूर लंग के समय भी नवाब कायम खान साहब हिसार में मौजूद थे। तैमूर लंग भारत में आक्रमण के बाद 15 दिन रहा। इस आक्रमण के बाद तुगलक वंश बिखर गया। तुगलक वंश के सरदारों ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इस समय नवाब कायम खां साहब भी स्वतंत्र शासक हो गए थे। दिल्ली की राजनीतिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। तब तैमूर लंग ने अपने एक सरदार सैयद खिज्र खान जो मुल्तान के आसपास के इलाकों में राज कार्य करता था। जिसको दिल्ली की गद्दी संभालने का हुकुम दिया। लेकिन खिज्र खां अकेला इस काम को करने में असमर्थ था। उसे मजबूत सरदार की मदद चाहिए थी। जो उसे दिल्ली की गद्दी पर बैठा सके तब खिज्र खान ने नवाब कायम खां साहब से मदद की दरख्वास्त की।  नवाब कायम खान साहब ने बिखरी हुई शासन व्यवस्था, कमजोर अर्थव्यवस्था तथा हिंदुस्तान को अखंड रखने के लिए दिल्ली में मजबूत शासन की स्थापना हेतु खिज्र खान की मदद की और उसे गद्दी पर बिठाया। खिज्र खान ने भी दोस्ती और वफादारी का इनाम नवाब कायम खां साहब को बक्शा और उन्हे दिल्ली सल्तनत का वजीर बनाया तथा संपूर्ण हिसार सूबे का गवर्नर बनाया। नवाब कायम खां के बढ़ते रसूख से कुछ दरबारियो ने खिज्र खान को नवाब कायम खां के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया और खिज्र खान के मन में इस बात को डाला कि नवाब कायम खां की बढ़ती शक्ति कहीं आपसे दिल्ली की गद्दी ना ले ले। आखिरकार बदायूं किले के घेरे की मुहिम पर जहां नवाब कायम खां साहब और खिज्र खान साहब थे और फौज का नेतृत्व कर रहे थे। तब चंद चापलूस सरदारों ने खिज्र खान से कहा कि कायम खां आज बगावत करके आपको मौत के घाट उतार देगा। इस झूठी अफवाह से खिज्र खान ने रात्रि में जहां खेमे लगे थे वहां जाकर नवाब कायम खां को धोखे से बुरी पूरी तरह घायल कर दिया। एक वाकिया यह भी मिलता है कि उन्हें हमला कर नदी में डाल दिया और वह नदी से जिंदा वापस निकल गए। इस हमले में नवाब कायम खां और उनके चंद वफादार साथियों ने अंत तक उनका मुकाबला किया और फिर नवाब कायम खां को घायल अवस्था में उनके साथी हिसार किले में लेकर आए। कायम खां रासो के अनुसार यहीं नवाब कायम खां का इंतकाल हुआ। यानी इस हमले की वजह से घायल होकर वह बाद में इलाज के दौरान शहीद हो गए यह तारीख 14 जून 1419 ईस्वी बताई जाती है। नवाब कायम खां साहब का मकबरा हांसी (हरियाणा) में कायमसर झील जो नवाब कायम खां साहब ने अपने शासनकाल में बनवाई थी के किनारे मौजूद है। वर्तमान में ये मकबरा जर्जर हो चुका है। हर साल 14 जून को नवाब कायम खां साहब के शहादत दिवस को पूरी कायमखानी कौम ‘नवाब कायम खां डे’ के तौर पर मना कर उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश करती है।

 

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