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कवि बशीर अहमद मयूख का 99 वर्ष की उम्र में निधन, साहित्य और आध्यात्मिक जगत में शोक

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  • हिंदुस्तानी तहज़ीब, कौमी एकता और साझी संस्कृति की मजबूत आवाज़ थे मयूख

कोटा, (रॉयल पत्रिका)। हिंदी के वरिष्ठ कवि, चिंतक और आध्यात्मिक साहित्य के प्रतीक बशीर अहमद मयूख का रविवार को 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने विज्ञान नगर स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। सोमवार सुबह जंगलीशाह बाबा कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनके निधन से साहित्य, संस्कृति और समाज में गहरा शोक व्याप्त है। बशीर मयूख केवल एक लेखक नहीं थे, वे विचार और आंदोलन थे। उन्होंने ऋग्वेद, कुरान, गीता, बाइबिल, जैन आगम और गुरुग्रंथ साहिब जैसे धर्मग्रंथों का काव्यानुवाद कर धार्मिक समरसता और आध्यात्मिक एकता का संदेश दिया। उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में स्वर्ण रेख, अर्हत, ज्योतिपथ, अवधूत अनहद नाद सुनो और शब्द रागी शामिल हैं। उनकी कई रचनाएं आज भी विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जाती हैं। उन्हें बिरला फाउंडेशन का बिहारी पुरस्कार, मूर्तिदेवी पुरस्कार, दशरथमल सिंघवी एकता सम्मान और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा विश्व हिंदी सम्मान (2018) प्राप्त हुआ। वे राजस्थान सरकार द्वारा साहित्यकार पेंशन प्राप्त करने वाले पहले साहित्यकारों में भी शामिल थे। राजनीति से संन्यास लेने के बाद मयूख ने कोटा में मयूखेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की, जो आज सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक स्थल बन चुका है। मंदिर के प्रवेश पर लिखा है: “ईश्वर, अल्लाह, वाहेगुरु, चाहे कहो श्रीराम – सबका मालिक एक है।” 15 अगस्त 1947 के दिन लिखी उनकी पंक्तियाँ  “तू हिन्दू नहीं, नहीं मुस्लिम, केवल हिंदुस्तानी बन” आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। बशीर मयूख अपने लेखन के माध्यम से धर्म नहीं, अध्यात्म की बात करते थे। उन्होंने जीवनभर इंसानियत, संवाद और समरसता की मशाल जलाए रखी। अपने अंतिम जन्मदिन पर उन्होंने लिखा था —
“मेरे जाने के बाद ज़माना पूछेगा, वो शायर कहां गया?
तो कहना, ‘वो शायर अब शब्दों की रोशनी में अमर है।’”

उनकी लेखनी, विचार और रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को इंसानियत और एकता का रास्ता दिखाती रहेंगी।

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