पूर्व प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने देश को आर्थिक संकट से उभारा था
डॉ मनमोहन सिंह का जाना हम सबके बीच से सबको अवाक कर गया और तत्पश्चात रिक्तता ने मन को घेर लिया। स्मृतियों के झरोखों ने मेरे उनसे संबंधों की यादों को जीवंत कर दिया । कैसे जब मैं विधायक था अलीगढ़ के पास एक ट्रेन दुर्घटना में उनका भांजा 2003 में गंभीर रूप से घायल हो गया था और अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुआ और उसके उपरांत उनके ऑफिस से मेरे पास फ़ोन आया यथासंभव मदद के लिए । मेरे से जो बन पड़ा, मैंने किया। प्रभु की कृपा से उसकी जान बच गई और अल्प अंतराल मैं डॉ साहब का फ़ोन मेरे पास आता है और प्रेमपूर्वक अपना आभार प्रकट करते हैं और कहते हैं दिल्ली जब भी आओ तो मिलना। जल्दी ही मिलना हुआ और वह मुलाक़ातें फिर नियमित रूप से होने लगीं और उनका आशीर्वाद का पात्र बना रहा। उनके वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप मैं कार्यकाल की उपलब्धियां अनेकों अनेक थीं जिनमें नवाचार था और जिन्होंने भारतीय सामाजिक परिवेश को संवेदनशीलता युक्त महत्व दिया एवं वंचित वर्ग के उत्थान में सहायक रहीं जैसे कि मनरेगा स्कीम, ”डायरेक्ट ट्रांसफर मैकेनिज्म“ योजना को व्यावहारिक रंग देकर आखिरी पायदान के व्यक्ति को सहारा दिया, राजनीतिक क्षेत्र में सत्ता को विनम्रता का तड़का दियाI डॉ मनमोहन सिंह जी जैसे व्यक्तित्व का उचित विश्लेषण करना हो तो उनकी मृत्यु के पश्चात लोगों की क्या धारणा उभर कर आ रही है उससे मिलता है। उसका निरूपण जब करते है तो प्रचुर मात्रा में सकारात्मक सोच देखने को मिलता है। चाहें उनके राजनीतिक विरोधी हों या विश्व के उनके समकालीन नेता हों उनकी ऑबिच्युरी एक स्वर में उन्हें आदर्श नेता के रूप मैं प्रस्तुत करती है। उनका मानवीय दृष्टिकोण और संवेदनशीलता मलेशिया के वर्तमान प्रधानमंत्री मुहम्मद इब्राहिम के वक्तव्य से परिलक्षित होती है जिसमें उन्होंने बताया कि उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान जब वह मलेशिया में कारावास में थे डॉ साहब ने उनके बच्चों के स्कालरशिप का प्रस्ताव दिया। माननीय मोहम्मद इब्राहिम जी दिवंगत व्यक्तित्व को अपना भाई और दोस्त कहकर संबोधित किया जिनके जाने का उन्हें बेहद अफ़सोस है या किसी पत्रकार का उन्हें “शांत सिंघम“ की उपाधि देना उनके शांत परंतु साहसिक व्यक्तित्व का परिचायक है।
वर्तमान में भारतीय सत्तारूढ़ दल के नेता जिन्होंने चुनावी राजनीति मैं उनके प्रति आलोचना की बाढ़ छोड़ दी थी आज चाहे प्रधानमंत्री हो चाहे राष्ट्रपति हो चाहे रक्षामंत्री हो सबने राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को एक स्वर से स्वीकारा हैं । परंतु यह श्रद्धांजलि वास्तविक तब प्रतीत होती अगर उसमें पश्चाताप के भी दो शब्द होते जो अतीत में शब्दों के बाड़ों से जो प्रहार किए गए वह अपेक्षित राजनीतिक मर्यादा से कोसों दूर थे जैसे मौन मौन सिंह और एक्सीडेंटल पीएम कहा गया, परंतु उनकी तरफ़ से व्यक्तित्व के अनुरूप कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। 2G स्कैम में किस तरह उनपर अनर्गल के आरोप लगाये गए लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला सुनाया इसमें यह आरोप बेबुनियाद निकले परन्तु अक्षेप लगाने वालों की तरफ़ से कोई मलाल इंगित नहीं हुआ I वर्तमान समय के सरकार के मुखिया के सापेक्ष याद कीजिए कि प्रधानमन्त्री की हैसियत से प्रेस से नियमित रूप से साक्षात्कार किया और गतिशील लोकतंत्र में संवर्धन किया I स्मरण कीजिए डॉ साहब का वह 2007 का साहसिक कदम जिसमें विषम परिस्थितियों के होते हुए और संसद में घोर विरोध के बावजूद राष्ट्रहित को समक्ष रखते हुए सरकार को ख़तरे में डालते हुए सत्ता की परवाह नहीं की और अमेरिका के साथ परमाणु संधि पर समझौता किया और तत्पश्चात भारत का नाभिकीय क्षेत्र में बहिष्कार समाप्त हुआ जिसके फलस्वरूप भारत परमाणु क्लब का सदस्य बन सका और ये सब आधारशिला बने, अमेरिका और भारत के वर्तमान रिश्तों में प्रंगाढ़ता की और जिसका वर्तमान अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने संवेदना संदेश में रेखांकित किया है। 1991 में वित्तमंत्री के रूप मैं जब आर्थिक संकट की घटा देश पर छायी हुई थी उन्होंने अर्थशास्त्र के अध्येता के रूप में तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनजर उदारीकरण की नीति का क्रियान्वयन कर देश को घोर संकट से उबारा जिसकी इबारत पर देश आगे बढ़ा और देखते देखते आज हम विश्व की पांचवीं आर्थिक शक्ति के रूप में उबरे हैं और इस तरह की पुष्टी संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटरेस के संवेदना संदेश में भी प्रतिम्बित होता हैI उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में जहाँ विश्व भर में आर्थिक मंदी का प्रकोप था, भारत ने रिकॉर्ड 8.1 %की प्रगति अर्जित की जिसके परिणामस्वरूप देश में 25 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा से उबरे। 2008 में विश्व में जब विश्व भर में मंदी छाई हुई थी तब दुनिया के नेताओं ने उनसे सलाह ली उन परिस्थितियों से निबटने की। उनकी शालीनता ने सबका दिल जीता और UGC के चेयरमैन पदभार के दौरान उनका दफ़्तर साइकिल से जाना काफी चर्चित रहाI जब हम वर्तमान नेताओं से तुलना करें तो कभी भी उन्होंने अपनी पारिवारिक प्रष्ठभूमि की ग़रीबी का ढिंढोरा पीटकर लोगों की सहानुभूति बटोरने की कोशिश नहीं की और ना ही अपनी केम्ब्रिज और ऑक्सफ़ोर्ड की शिक्षा को लेकर लोगों पर धाक जमाने की कोशिश की। उनकी सादगी की पुष्टि उनके तत्कालीन सुरक्षा अधिकारी और वर्तमान में यू पी सरकार के मंत्री ने की है किस तरह उन्हें अपनी मारुति 800 बीएमडबल्यू की तुलना में ज़्यादा रास आती थी।

विवेक बंसल,
पूर्व विधायक
अलीगढ़, उत्तर प्रदेश।
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