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ग़ज़ल

Jaipur

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पूछोगे   नहीं  हाल  के  किस   हाल  में   हूं  मैं

इतना  भी  बुरा  हूं  नहीं  दिल  तोड़ने  के  बाद

अच्छा  यही  बता  दो के खुश हाल तो हैं आप

क़िस्मत  से  फिर  मिले  हैं  घर छोड़ने के बाद

कुछ  रंज था कभी के  बिछड़कर  क्या मिलेंगे

अब खुश तो हो गये हो ना दिल जोड़ने के बाद

अय्याम   पे  हंसे   थे  तुम्हीं   कुछ  तो  याद  है

चादर  के  दाग़  छिप   गये   निचोड़ने  के  बाद

कैसे   मिलेंगे   वक़्त   ने   अलहेदा  कर  दिया

अब  मुझसे  पूछते  हो  सब  बिगाड़ने  के बाद

पछतावा  ज़िन्दगी  को  कुछ  इस  तरह का है

तूफां  को  कोसना  है  अब   उजाड़ने  के  बाद

मतलब  से  मिल रहे  हैं   क़िस्मत  से नहीं अब

अपना  नफा  तराज़ू   में  सब  तौलने  के  बाद

चुपचाप   पशेमां   हैं   तमाशा    बना   के   वो

इस   हाल  में  आए  हैं   जो   ताड़ने   के  बाद

 

मौलिक रचना:- फ़ज़लुर्रहमान

सहायक सचिव सेवानिवृत्त

मोबाईल नं 9828668877

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