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ज़कात के सही उपयोग से दूर हो सकती है मुसलमानों की ग़रीबी

Jaipur

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मुस्लिम समाज में हर साल अल्लाह के नाम पर दिए जाने वाले हज़ारों करोड़ रुपए का दान निकलता है। अगर समाज में ग़रीबी जस की तस बनी हुई है तो सवाल पैदा हौता है कि अमीर मुसलमानों की तिजोरियों से ज़कात, ख़ैरात, फ़ितरे और सदक़े के नाम पर निकलने वाला हजारों करोंड़ रुपए का दान कहां जा रहा है? मुसलमानों की ज़कात सही जगह नहीं पहुंच रही। कुछ लोग ग़लत तरीक़े से ग़रीब, यतीम बच्चों, विधवा औरतों और बेसहारा लोगों के हिस्से की ज़कात डकार जाते हैं। देश की जनसंख्या को लेकर 2011 के आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान रोज़गार के मामले में देश के अन्य धार्मिक समुदायों के मुक़ाबले सबसे पीछे हैं। जहां 33 फीसदी मुसलमानों को ही रोज़गार मिला हुआ है। वहीं जैन और सिख समुदायों के 36 फीसदी लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। हिंदू समुदाय को 41 फीसदी और बौद्ध समुदाय के 43 फीसदी लोगों को रोजगार मिला हुआ है। नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया के अध्यन के मुताबिक़ प्रत्येक 4 में से एक मुसलमान ग़रीब है। देश के सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमान सबसे ज्यादा ग़रीब हैं।

नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के अध्यन के मुताबिक शहरी इलाकों में हर 10 में से 3 मुसलमान ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। उनकी औसत मासिक आमदनी 550 रुपए है। ग्रामीण इलाकों में हालात और भी बुरे हैं। हर पांचवा मुसलमान ग़रीबी रेखा से नीचे औसतन 338 रुपए मासिक आमदनी पर गुज़र बसर कर रहा है। देश की आबादी में छोटी आबादी वाला सिख, जहां 53 रुपए रोज खर्च करता है। वहीं मुसलमान महज़ 32.7 रुपए ही खर्च कर पाता है। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफिस के मुताबिक 2009-10 में मुस्लिम समुदाय का प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 980 रुपए थी। जबकि सिख समुदाय की सबसे अधिक 1659 रुपए थी। बाकी धार्मिक समुदायों का मासिक ख़र्च भी इसी के आस पास रहा।

मुस्लिम समुदाय बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रहा है

ये रिपोर्ट बताती है कि देश में मुस्लिम समुदाय ग़रीबी और आर्थिक तंगी के बेहद मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। सर्वे के मुताबिक़ देश में एक औसत मुस्लिम परिवार की सालाना आमदनी 28,500 रुपए थी, जो कि दलित और आदिवासियों के मुकाबले बस थोड़ी सी ही ज्यादा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में ग़रीबी धीरे-धीरे कम हो रही है, लेकिन अफसोस की बात है कि मुस्लिम समुदाय में ग़रीबी के कम होने की रफ्तार बहुत धीमी है। 2004-05 के मुकाबले 2009-10 के सर्वे में जहां हिंदू समुदाय में गरीबी 52 फीसदी की रफ्तार से कम हुई है। वहीं मुस्लिम समुदाय में इसकी रफ्तार सिर्फ 39 फीसदी है। तमाम सरकरी आंकडे बताते हैं कि ग़रीबी की वजह से पूरे मुस्लिम समुदाय के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। मुस्लिस समुदाय में सबसे ज्यादा 3 फीसदी बाल मज़दूर पाए जाते हैं। इस समुदाय के 6 से 17 साल की उम्र के 28.8 फीसदी बच्चे स्कूल का मुंह तक नहीं देख पाते। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का चालू वित्त वर्ष का 5020.50 करोड़ रुपए है। इसमें मंत्रालय देश के 6 अंल्पसखंयक समुदायों के विकास के लिए काम करता है। इनमें ज्यादातर स्कूली छात्रों को मिलने वाले स्कॉलरशिप पर ही खर्च होता है। मुसलमानों के विकास के लिए सरकार के पास किसी भी मद में 1000 करोड़ रुपए से ज्यादा का बजट नहीं होगा। मुसलमान हर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के खिलाफ रोना रोते रहते हैं कि वो उनके लिए कुछ नहीं कर रहीं।

मुसलमान ख़ुद अपने लिए क्या कर रहे हैं?

अब हम बात करते हैं मुसलमान ख़ुद अपने लिए क्या कर रहे हैं? मुस्लिम समाज में हर साल अल्लाह के नाम पर दिए जाने वाले हज़ारों करोड़ रुपए का दान निकलता है। अगर समाज में ग़रीबी जस की तस बनी हुई है तो सवाल पैदा हौता है कि अमीर मुसलमानों की तिजोरियों से ज़कात, ख़ैरात, फ़ितरे और सदक़े के नाम पर निकलने वाला हजारों करोंड़ रुपए का दान कहां जा रहा है? ये पैसा मुस्लिम समाज को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रुप से मज़बूत बनाने के लिए क्यों इस्तेमाल नहीं हो पा रहा? मुंबई में आल इंडिया कौंसिल ऑफ़ मुस्लिम इकोनॉमिक अपलिफ्टमेंट से जुड़े ड़ॉ. रहमतुल्ला के मुताबिक देश भर में हर साल क़रीब पचास हजार करोड़ रुपए की ज़कात निकलती है। लेकिन ज़कात की बड़ी रक़म ग़रीब मुसलमानों तक पहुंचने के बजाय ज़कात माफ़ियाओं के पेट में चली जाती है। ज़कात निकालने वाले अमीर मुसलमान खुश होते हैं कि उन्होंने ज़कात निकाल कर अपना फर्ज़ पूरा कर दिया। लेकिन हकीकत ये है कि देश भर में मदरसों से जुड़े लोग यतीम बच्चों के नाम पर ज़कात इकट्ठा करके ले जाते हैं। बाद में यतीमों के नाम पर इकट्ठा किया गया ये पैसा, यतीम बच्चों से अपने नाम करा कर उसे अपनी निजी संपत्ति में जोड़ लेते है।

कई खुशनसीब मुसलमानों तक मदद पहुंचती भी है, लेकिन करोड़ों मुसलमानों की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं। वो साल दर साल इसी उम्मीद मे जीते हैं कि उन्हें अपने आर्थिक हालात बदलन के लिए कहीं से मदद मिल जाए। लेकिन उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आम मुसलमान ज़कात के महत्व, अहमियत और इसे लेकर क़ुरआन के आदेशों से वाक़िफ नहीं हैं। उसे नहीं पता कि इसके इस्तेमाल से देश के आर्थिक रूप से सबसे कमज़ोर तबक़े को मज़बूत बनाकर मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है।

 

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