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मौत के बाद ट्रांसफर, विधायक बना पटवारी; राजस्थान में 22 दिन चली ‘ट्रांसफर एक्सप्रेस’ ने खोली सिस्टम की पोल!

मौत के बाद ट्रांसफर, विधायक बना पटवारी; राजस्थान में 22 दिन चली ‘ट्रांसफर एक्सप्रेस’ ने खोली सिस्टम की पोल!

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जयपुर। राजस्थान सरकार ने 19 जून से 10 जुलाई तक प्रदेशभर में बड़े पैमाने पर तबादले किए। 22 दिनों के दौरान अलग-अलग विभागों, बोर्डों और निगमों में करीब सवा लाख अधिकारियों और कर्मचारियों के ट्रांसफर किए गए। 22 दिनों की चली ट्रांसफर एक्सप्रेस में अधिकारियों ने जल्दबाजी और लापरवाही के ऐसे-ऐसे ‘डिजिटल रिकॉर्ड’ बनाए हैं। इतनी बड़ी प्रक्रिया के बीच कई ऐसी गलतियां सामने आईं। जो अब सोशल मीडिया पर हंसी का पात्र बनने के साथ-साथ व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। कहीं मृत कर्मचारियों के ट्रांसफर ऑर्डर जारी कर दिए गए, तो कहीं विधायकों को ही कर्मचारी बनाकर उनका तबादला कर दिया गया। एक सूची में तो ऐसा नोट छप गया, जिसे पढ़कर कर्मचारी भी हैरान रह गए। इन घटनाओं ने सिर्फ सोशल मीडिया पर चर्चा नहीं छेड़ी, बल्कि यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या सरकारी तबादला सूची सिर्फ फाइलों के आधार पर तैयार होती है या किसी स्तर पर उसका वास्तविक सत्यापन भी किया जाता है?

मौत के बाद भी जारी हुई तबादला सूची

सबसे ज्यादा चर्चा बाड़मेर में बाटाडू चौकी के प्रभारी रहे एएसआई अनोपाराम के मामले की हुई। 1 जुलाई को बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार भी हो गया। परिवार शोक में था। उनकी मौत के 8 दिन बाद यानी 9 जुलाई को जोधपुर रेंज पुलिस की तबादला सूची आई और उसमें अनोपाराम का नाम बाड़मेर से उनके गृह जिले बालोतरा स्थानांतरित कर दिया गया। यह मामला अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने कई सवाल उठाए और ये सवाल सिर्फ एक आदेश के लिए नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए थे।

जो अधिकारी है ही नहीं, उसे धौलपुर लगाया

वहीं वन विभाग की सूची में भी एक ऐसा अधिकारी ट्रांसफर कर दिया गया, जो संबंधित कार्यालय में तैनात ही नहीं था। वन विभाग की ओर से 10 जुलाई को डीएफओ से लेकर रेंजर स्तर के अधिकारियों की तबादला सूची जारी की गई थी। विभाग ने सूची में राजीव शर्मा नामक अधिकारी को उपवन संरक्षक कार्यालय उदयपुर में एसीएफ के पद पर तैनात बताते हुए, उनका तबादला एसीएफ वन्यजीव मुख्यालय चंबल घड़ियाल अभयारण्य धौलपुर के पद पर कर दिया है। हैरान करने वाली बात यह है कि राजीव शर्मा नाम का कोई एसीएफ अभी उदयपुर उत्तर कार्यालय में कार्यरत ही नहीं है।

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पटवारी की जगह विधायक का ट्रांसफर

राजस्व विभाग की सूची में भी कम दिलचस्प वाकया नहीं हुआ। बालोतरा से डीग भेजे गए पटवारी नरेंद्र सिंह की जगह टाइपिंग की गलती से डीग विधायक शैलेष सिंह का नाम ट्रांसफर सूची में दर्ज हो गया। सूची वायरल हुई तो लोग मजाक में पूछने लगे- अब विधायक भी विभागीय तबादले से चलेंगे? हालांकि बाद में विभाग ने अपनी गलती सुधार ली लेकिन तब तक यह सूची सोशल मीडिया पर हजारों बार शेयर हो चुकी थी।

सरकारी आदेश में पहुंचा अनोखा नोट

इससे पहले सूचना सहायकों की तबादला सूची में भी एक कर्मचारी के नाम के सामने विशेष टिप्पणी वाले कॉलम में लिखा था- “MLA KA 0 KHATAM KARNE K LIYE” (यानी एमएलए का ओ खत्म करने के लिए) यह संभवतः किसी अधिकारी या कर्मचारी का आंतरिक नोट था, जो गलती से अंतिम सूची में ही छप गया। सरकारी आदेश वायरल हुआ और लोगों ने सवाल उठाया कि यदि अंतिम आदेश से ड्राफ्ट नोट तक नहीं हटाए जा रहे हैं, तो बाकी सूचनाओं की जांच कितनी गंभीरता से की गई होगी?

शिक्षक की मौत के बाद मिला तबादला

यह मामला शिक्षा विभाग का है। दरअसल, बीकानेर के शिक्षक गणेश प्रकाश जोहिया कई सालों से अपने घर के पास तबादले की मांग कर रहे थे। कई आवेदन भी दिए, लेकिन मनचाही पोस्टिंग नहीं मिली। बीते 30 जून को गणेश प्रकाश जोहिया ने उदरासर उपस्वास्थ्य केंद्र परिसर स्थित अपने आवासीय कक्ष में सुसाइड कर लिया। उनकी मौत से परिवार, सहकर्मियों और ग्रामीणों में शोक की लहर दौड़ गई थी। मामला अभी लोगों की स्मृतियों में ताजा ही था कि शिक्षा विभाग की नई तबादला सूची में उनका नाम सामने आ गया और उन्हें नए स्कूल में स्थानांतरित कर दिया गया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं थी, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता पर भी सवाल था।

गलती फाइल की या सिस्टम की?

विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर हुए तबादले कम समय में तैयार होने, रिकॉर्ड समय पर अपडेट नहीं होने और अंतिम सत्यापन की कमजोर प्रक्रिया ऐसी चूकों की मुख्य वजह हो सकती है। डिजिटल युग में भी यदि किसी मृत कर्मचारी का नाम सक्रिय सेवा रिकॉर्ड में बना रहता है, किसी विधायक का नाम पटवारी की जगह दर्ज हो जाता है या ड्राफ्ट नोट सीधे सरकारी आदेश में छप जाता है तो यह केवल टाइपिंग मिस्टेक नहीं बल्कि डेटा मैनेजमेंट और गुणवत्ता नियंत्रण पर बड़ा सवाल है।

सबकी नजर अब संशोधित सूचियों पर

सरकारी विभाग इन मामलों को मानवीय त्रुटि बताते हुए संशोधित आदेश जारी करने की बात कह रहे हैं लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि तबादला सूची केवल कर्मचारियों के कार्यस्थल नहीं बदलती, बल्कि कई बार वह सरकारी व्यवस्था की कार्यशैली भी सबके सामने ला देती है। इस बार राजस्थान की तबादला सूची ने सिर्फ कर्मचारियों के पते नहीं बदले, बल्कि सरकारी सिस्टम की कई परतें भी खोल दीं।

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