मुसलमानों के लिए इंसाफ हासिल करना हुआ मुश्किल
मुसलमानों के खिलाफ जो नफरत की हवा चल रही थी। अब वह आँधी में बदल चुकी है और इस आँधी की जद में देश का संविधान, न्यायपालिका सब आ गये हैं।
मुसलमानों के खिलाफ जो नफरत की हवा चल रही थी, वह अब आँधी में बदल चुकी है और इस आँधी की जद में देश की न्यायपालिका संविधान सब आ गये हैं। इस आँधी को समझने के लिए उन घटनाओं को समझना होगा जिसमें मुसलमानों के खिलाफ नफरती भाषण है। मुसलमानों को खुले आम घर वापसी करने का ऐलान है। पूरे देश में चल रहे विरोध हिन्दू सम्मेलन है। जहाँ मंच से खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत है। हेट स्पीच पर अदालतों का रूख है। इन सबसे साबित हो आ जायेगा कि कैसे आज भारत में मुसलमानों के लिए इंसाफ हासिल करना भी मुश्किल हो गया है। हेट स्पीच मामले में खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में गाइड लाइन जारी की थी कि यदि कोई व्यक्ति हेट स्पीच के जरिये किसी भी समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाता है तो स्थानीय पुलिस को स्वत: संज्ञान लेकर ऐसे व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी होगी और पुलिस ऐसा नहीं करती है तो उस राज्य के हाईकोर्ट को ऐसे मामले में स्वत: संज्ञान लेना चाहिये। लेकिन मुसलमानों के खिलाफ हेट स्पीचों की बाढ़ आयी हुई है और सुप्रीम कोर्ट की यह गाइड लाईन मुसलमानों के खिलाफ चल रही नफरत की आँधी में कहीं हवा में उड़ गई है। कुछ घटनाओें से इन हालातों को समझते हैं। शुरूआत असम के मुख्यमंत्री हेमन्त बिस्वा सरमा से करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी मियां मुसलमान का रिक्शा का किराया पाँच रूपये बनते हैं तो उसे चार रूपये ही दो और परेशान करो। फिर उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि एसआईआर में से पाँच लाख मुसलमानों के नाम वोटिंग लिस्ट से काटने हैं। यानि नाम काटना चुनाव आयोग तय नहीं करेगा। यह काम असम का मुख्यमंत्री करेगा ।I इससे भी आगे बढ़कर असम के मुख्यमंत्री ने एक विडियो जारी किया जिसमें वह हथियार से मुस्लिमों के फोटो पर गोली मार रहा है। जब इस पर बवाल मचा तो विडियो हटा लिया गया। लेकिन हैरानी की बात अब आती है। संविधान के अनुच्छेद 32 में भारत के प्रत्येक नागरिक का अधिकार है कि इस अनुच्छेद के कारण कोई व्यक्ति सीधा इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है। जब असम के मुख्यमंत्री की इस हेट स्पीच को लेकर पीड़ित लोग सुप्रीम कोर्ट में गये तो सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायधीश ने इस पर सुनवाई करने से इंकार करते हुए कहा कि पहले हाईकोर्ट जाओ। जबकि यही सुप्रीम कोर्ट था, यही मुख्य न्यायधीश थे। जब यूजीसी ने एसटी, एससी, ओबीसी के छात्रों को कैम्पस में उत्पीड़न से रोकने के लिए गाइड लाईन्स जारी की तो सुप्रीम कोर्ट तुरन्त सुनने को तैयार हो गया और पहले की सुनवायी में इन पर रोक लगा दी। बंगाल में एसआईआर मामले में तो गजब कर दिया । ईडी ने जब तृणमूल कॉंग्रेस के कार्यालयों पर छापा मारा और ईडी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी में विवाद हो गया । मामले की सुनवाई कोलकता हाई कोर्ट में चल रही थी। इसी बीच ईडी सीधी सुप्रीम कोर्ट आ गई। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि पहले कोलकाता हाईकोर्ट की सुनवाई होने दीजिये फिर सुनवाई करेंगे। ऐसा नहीं हुआ बल्कि सुप्रीम कोर्ट नें खुद सुनवाई की । इस घटना से आप समझ सकते हैं कि मुसलमानों को इंसाफ हासिल करने में भी कैसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
भारत का संविधान भारत के प्रत्येक नागरिक को अपनी मर्जी का धर्म मानने की आजादी देता है और दूसरे धर्म के व्यक्ति को प्रलोभन देकर धर्म परिर्वतन करना कानूनी अपराध होता है। लेकिन एक तथाकथित सांस्कृतिक संगठन के मुखिया देश के मुसलमानों को खुलेआम घर वापसी का ऐलान करता है और विकास में शामिल होने का प्रलोभन देता है और इस बयान पर हर तरफ सन्नाटा है। कोई इस बयान के खिलाफ बोलने का साहस नहीं कर रहा है। अब जरा कल्पना कीजिये कि मुस्लिम धार्मिक संस्था का जिम्मेदार व्यक्ति उनकी धार्मिक आस्था जिसमें उनका मानना है कि दुनिया में जितने भी इंसान हैं वे सब हज़रत आदम की औलाद हैं। इसलिए सब आपस में भाई हैं और हज़रत आदम का मूल धर्म इस्लाम था। इस आस्था की बुनियाद पर अगर कोई मुस्लिम धार्मिक संस्थान का जिम्मेदार भी मूल धर्म की तरफ वापसी का ऐलान कर देता तो क्या ऐसा ही सन्नाटा रहता या कोहराम मच जाता। बयान देने वाले व्यक्ति के खिलाफ पूरे देश में एफआईआर दर्ज करवाने की बाढ़ आ जाती और बहुत सारे बुलडोजर आ जाते। बयान देने वाले और उसके रिश्तेदारों के घर तोड़ने के लिए । न्यायपालिका भी तुरन्त संज्ञान ले लेती कि यह बयान विभाजनकारी और देश को तोड़ने वाला है। आज कल पूरे देश के विराट हिन्दू सम्मेलनों की बाढ़ आई हुई है । देश के हर छोटे-बड़े शहरों में विराट हिन्दू सम्मेलनों का आयोजन हो रहा है। इन विराट सम्मेलनों में मंचों से सनातन संस्कृति मजबूत करने या देश की समस्याओं के समाधान की चर्चा नहीं होती है। इनमें मंच से खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई जाती है । पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बनकर सुनता रहता है। अदालतें खामोश हैं। कुछ तथ्य तो हैरान करने वाले हैं कि ऐसे कुछ सम्मेलन आयोजित करने वाली सस्थाओं को सरकारी अनुदान भी दिया था। यानि सरकारी धन का इस्तेमाल अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिये इस्तेमाल हुआ। इन धारणाओं से आप समझ सकते हैं कि देश में क्या हो रहा है और देश किधर जा रहा है ? यूपी पुलिस ने तो गजब कर दिया कुछ लोग अपने घर में जुमे की नमाज़ पढ़ रहे थे। पुलिस ने सामूहिक नमाज़ को अपराध मानकर नमाज़ पढ़ने वालों को ही गिरफ्तार कर लिया। मामला जब इलाहबाद हाईकोर्ट गया तो कोई इस कार्यवाही को गैर-कानूनी मानते हुए उस एफआईआर को खारिज किया और दोषी पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया। उतराखण्ड में तो शायद कानून का राज ही खत्म हो गया है। एक मुस्लिम ने अपनी दुकान का नाम बाबा रख लिया तो बजरंग दल के गुण्डों की आस्था आहत हो गयी। जबकि बाबा शब्द फारसी और अरबी भाषा से निकला हुआ है। लेकिन गुण्डों की इससे आस्था आहत हो गई । जबकि बाबा शब्द फ़ारसी और अरबी भाषा से निकला हुआ है । लेकिन गुंडों को इससे कोई वास्ता नहीं था । उनका टारगेट तो मुसलमानों को परेशान करना था।
आज देश में मुसलमानों के लिए हर जगह परेशानियाँ खड़ी की जा रही हैं। उनके आर्थिक बहिष्कार का ऐलान होता है। उनके मकान खरीदने को पलायन से जोड़ा जाता है। अजान की आवाज़ से दिक्कत होती है । अब देश की धर्म निरपेक्ष जनता को सोचना है कि यदि आज उन्होंने इन अराजक तत्वों का विरोध नहीं किया और खामोश रहे तो उनकी यह खामोशी देश के भाईचारे को खत्म करेगी । देश के संविधान को देश के लोकतन्त्र को कमजोर करेगी । इसलिए देश के लोकतन्त्र, संविधान और आपसी भाईचारे को बचाने के लिए देश में मोहब्बत करने वाले प्रत्येक नागरिकों को एकजुट होकर इन अराजक तत्वों के खिलाफ खड़ा होना होगा।
-डॉ. शाहबुद्दीन ख़ान
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