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अरुजी समरकंदी: इस्लामिक स्वर्ण युग के ‘सांस्कृतिक राजदूत’;

जयपुर

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जिनकी एक किताब ने बचाया 100 विद्वानों का इतिहास

इब्न सिना का ‘क्वारंटाइन’ और अल-बिरूनी की भविष्यवाणी; 12वीं सदी के विज्ञान और कला का अनूठा दस्तावेज

समरकंद/इतिहास डेस्क। जब भी इस्लामिक स्वर्ण युग के अबू नसर मंसूर और अल-बिरूनी के दौर की बात होती है, तो निजामी अरुजी समरकंदी का नाम एक ‘सांस्कृतिक राजदूत’ के रूप में उभरता है। 12वीं शताब्दी के यह प्रसिद्ध फारसी लेखक, कवि और इतिहासकार न होते, तो आज दुनिया को कई महान वैज्ञानिकों के जीवन के दिलचस्प किस्सों की जानकारी शायद कभी न मिल पाती।

‘चहार मकाला’: इतिहास का झरोखा

अरुजी समरकंदी (1110-1161 ई.) समरकंद (आधुनिक उज्बेकिस्तान) के निवासी थे। वे केवल एक लेखक नहीं, बल्कि ज्योतिष और चिकित्सा में भी निपुण थे। उनकी एकमात्र उपलब्ध पुस्तक ‘चहार मकाला’ (Chahar Maqala) को मध्यकालीन इस्लामिक सभ्यता को समझने का सबसे विश्वसनीय स्रोत माना जाता है। इस पुस्तक ने दुनिया को 100 से अधिक ऐसे विद्वानों के कार्यों की जानकारी दी, जो अन्यथा लुप्त हो चुके होते।

अरुजी का मानना था कि साम्राज्य की सफलता केवल सुल्तान पर नहीं, बल्कि उसके दरबार के विशेषज्ञों पर निर्भर करती है। उन्होंने दरबार के चार प्रमुख स्तंभ बताए:

  • सचिव (Secretaries): सुल्तान की ‘जुबान’ और ‘हाथ’। अरुजी के अनुसार, एक सचिव का पत्र तलवार से भी अधिक शक्तिशाली होना चाहिए।

  • कवि (Poets): जो राजा को अमर बनाते हैं। अरुजी ने लिखा है कि एक कवि सुल्तान के क्रोध को शांत कर सकता है और युद्ध में सैनिकों का उत्साह बढ़ा सकता है।

  • ज्योतिषी (Astrologers): जो संकटों से पूर्व चेतावनी देते हैं और समय की गणना करते हैं।

  • चिकित्सक (Physicians): जो न केवल शरीर बल्कि आत्मा का भी इलाज करते हैं।

अल-बिरूनी और सुल्तान गजनवी की चुनौती

अरुजी ने अपनी किताब में एक बेहद रोचक किस्सा दर्ज किया है। सुल्तान महमूद गजनवी ने महान वैज्ञानिक अल-बिरूनी की परीक्षा लेनी चाही। सुल्तान ने एक कमरे में, जिसमें चार दरवाजे थे, अल-बिरूनी से पूछा— “मैं किस दरवाजे से बाहर निकलूंगा?”

अल-बिरूनी ने गणना की और जवाब एक कागज पर लिखकर तकिए के नीचे रख दिया। सुल्तान ने उसे गलत साबित करने के लिए दीवार तुड़वाकर पांचवां रास्ता बनवाया और वहां से निकला। लेकिन जब उसने कागज देखा तो दंग रह गया। उस पर लिखा था: “सुल्तान न चारों दरवाजों से निकलेंगे, न छत से; वे दीवार तुड़वाकर नया रास्ता बनाएंगे।” यह किस्सा बताता है कि उस दौर में गणित और मानव मनोविज्ञान का मेल कितना गहरा था।

उमर खय्याम: कवि ही नहीं, महान खगोलशास्त्री भी

दुनिया उमर खय्याम को उनकी रुबाइयों (कविताओं) के लिए जानती है, लेकिन अरुजी ने बताया कि वे एक महान खगोलशास्त्री थे।

  • जलाली कैलेंडर: खय्याम ने आज के ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ से भी सटीक ‘जलाली कैलेंडर’ बनाया था, जिससे नौरोज़ (नया साल) ठीक उसी पल मनाया जाता था जब सूर्य भूमध्य रेखा को पार करता था।

  • भविष्यवाणी: खय्याम ने कहा था, “मेरी कब्र ऐसी जगह होगी जहाँ साल में दो बार फूल गिरेंगे।” अरुजी लिखते हैं कि वर्षों बाद जब वे उनकी कब्र पर गए, तो वह नाशपाती और खुबानी के फूलों से ढकी हुई थी।

इब्न सिना और ‘गाय’ बनने का भ्रम

चिकित्सा विज्ञान के पितामह इब्न सिना (Avicenna) के इलाज के तरीके अद्भुत थे। अरुजी ने एक राजकुमार का किस्सा लिखा है जो मानसिक रूप से बीमार होकर खुद को ‘गाय’ समझने लगा था और कहता था कि “मुझे काट दो।” इब्न सिना ने कसाई का वेश धारण किया और कहा, “यह गाय बहुत दुबली है, इसे खिला-पिलाकर मोटी करो, फिर काटूँगा।” राजकुमार ने खाना शुरू किया, उसकी सेहत सुधरी और उसका मानसिक भ्रम दूर हो गया।

क्वारंटाइन का जनक: इब्न सिना ने ही सबसे पहले ‘अल-अरबैनिया’ (40 दिन अलग रहने) का सिद्धांत दिया था, जिसे आज हम ‘क्वारंटाइन’ (Quarantine) कहते हैं।

निष्कर्ष: ‘पॉलीमैथ’ का युग

अरुजी समरकंदी की लेखनी साबित करती है कि मध्यकालीन वैज्ञानिक केवल एक विषय के ज्ञाता नहीं थे, वे ‘पॉलीमैथ’ (Polymaths) थे। मंसूर ने गणित दिया, खय्याम ने समय मापा, और इब्न सिना ने जीवन रक्षा के सूत्र दिए। अरुजी समरकंदी ने इन सबको अपनी कलम से इतिहास में अमर कर दिया।

– फ़ज़लुर्रहमान

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