Loading...

ज़िगर मुरादाबादी और नाते रसूल (स.अ.व.):

जयपुर

Follow us

Share

एक रिंद की तौबा और इश्के नबी

उर्दू गज़ल के स्तम्भ: ज़िगर मुरादाबादी

बक़ौल रशीद अहमद सिद्दीकी:

“बीसवीं सदी में गज़ल गोई के हज़रत फ़ानी, असगर और जिगर ऐसे मुस्तक़ीम (मज़बूत) सुतून थे जिन पर जदीद गज़ल की इमारत कायम है, जो बड़ी खूबसूरत है। ज़िगर मुरादाबादी अपनी सीरत में शख्सियत के एतबार से अपनी कलम से भी ज्यादा दिल आवेज़ और क़ाबिले एहतराम थे।”

शराब की लत और उनका व्यवहार

जिगर साहब अपनी जिंदगी में ‘दुख्तरे रंज’ (शराब) के बड़े शौकीन थे। आप हर वक़्त उसके सुरूर में डूबे रहते थे। हालांकि, उन पर शराब का कितना ही गलबा क्यों न होता, उनसे कोई ऐसी हरकत सरज़द न होती जिसको खिलाफ़े तहजीब माना जाता हो।

  • न उनकी ज़बान से कभी गैर-मोहज़्ज़ब अल्फाज निकलते थे।

  • न वो कभी लड़खड़ाते या गिरते थे।

  • न ही उन्हें कभी शोर-शराबा मचाते पाया गया।

रशीद अहमद सिद्दीकी अपने मज़मून ‘कुल्लियाते जिगर’ में लिखते हैं कि अक्सर ऐसा महसूस होता था कि केफ़ो-सुरूर बक्शने के बजाय शराब उनको इन्तेहाई दर्द और तकलीफ में मुब्तिला कर देती थी।

नातिया मुशायरा और तौबा का वाकया

एक बार ज़िगर साहब को एक नातिया मुशायरे का दावतनामा मौसूल हुआ। ज़िगर साहब वैसे तो बड़े मज़हब परस्त थे, मगर शराबनोशी के बाइस लोग समझते थे कि इनका मज़हब से कोई सरोकार नहीं है।

जब ज़िगर साहब ने जाने का इरादा किया, तो वे आत्मचिंतन में डूब गए। वे सोचने लगे, “मैं रिंद खाना खराब, हर वक़्त शराब की मस्ती में डूबा हुआ शख्स और कहां नात व मिदहते रसूल?”

बदलाव का पल

इसी ख्याल के साथ उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया:

  1. उन्होंने फौरन शराब से तौबा की।

  2. गुस्ल किया और पाक-साफ हुए।

  3. और फिर नाते नबी लिखने को क़लम उठाया।

इश्के रसूल में डूबकर उन्होंने एक नात मुकम्मल की। जब मुशायरे का दिन आया, तो ज़िगर साहब भी वहां तशरीफ़ ले गए।

मुशायरे में सन्नाटा

मुशायरे में जब अन्य शायरों ने ज़िगर साहब को देखा, तो सब सकते में आ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह रिंदी और मस्ती का शायर किस तरह नाते रसूल लिख सकता है। उन्हें क्या मालूम था कि ज़िगर जितना रिंद है, उससे कहीं ज्यादा आशिके रसूल है।

ज़िगर साहब मिजाज शनास (लोगों की नब्ज़ पहचानने वाले) भी थे। उन्होंने शायरों के मिज़ाज़ और ज़हनी कैफियत को भांप लिया और कहा, “हज़रात! नात तो सुन लीजिए, फिर फैसला कीजिए।”

इसके बाद उन्होंने पुरनम आंखों और पुरजोश अंदाज में वह मशहूर नात पढ़ी:

नाते रसूल (स.अ.व.)

एक रिंद है और उम्मते सुल्ताने मदीना, हां कोई नजरे रहमत सुल्ताने मदीना।

तू सुबह अज़ल आइनाए हुस्ने अज़ल भी, ए सल्ले अला सूरते सुल्ताने मदीना।

ए खाके मदीना तेरी गलियों के तसददुक, तू खुल्द है तू जन्नत सुल्ताने मदीना।

इस तरह कि हर सांस हो मसरूफ़े इबादत, देखूं दर दौलते सुल्ताने मदीना।

दामने नज़र तंग व फ़रावानीय जलवा, ए तलअते हक़ तलअते सुल्ताने मदीना।

एक नंगे गमे इश्क़ भी है मुंतज़िरे दीद, सदके तेरे ए सुल्ताने मदीना।

कोनेन का ग़म, यादें खुदा, दर्दे शफ़ाअत, दौलत है यही दौलते सुल्ताने मदीना।

ए आलमे तक़्वी तेरे इसरारे हक़ीक़त, मिन जुमला एक आयते सुल्ताने मदीना।

ज़ाहिर में ग़रीबुल गुरबा, फिर भी यह आलम, शाहों से सवा सिलवते सुल्ताने मदीना।

ए जांबलब आयदल, होशियार खबरदार, वोह सामने हैं हज़रते सुल्ताने मदीना।

कुछ हमको नहीं काम “ज़िगर” और किसी से, काफी है बस एक निसबते सुल्ताने मदीना।


शब्दार्थ (Glossary)

  • तसददुक: सदक़े / कुर्बान

  • फ़रावानी: बहुत ज्यादा / अधिकता

  • तलअत: दीदार / चेहरा

  • नंगे: शर्म वाला

  • सितवत: दबदबा / शान

  • आसी: गुनाहगार

  • जांबलब: मरने के करीब

  • अयदह: आया हुआ

  • तकवीं: पैदा करना / वजूद में लाना

– हबीबुल्लाह एडवोकेट, जवाहर नगर, जयपुर

Disclaimer

Royal Patrika is an independent news portal and weekly newspaper. Content is published for informational purposes only. Royal Patrika does not take responsibility for errors, omissions, or actions taken based on published information.

Royal Patrika एक स्वतंत्र समाचार पोर्टल और साप्ताहिक समाचार पत्र है। यहां प्रकाशित सामग्री केवल सूचना के उद्देश्य से है। प्रकाशित जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय, त्रुटि या नुकसान के लिए Royal Patrika जिम्मेदार नहीं होगा।