चर्चों और मस्जिदों पर हमले:
देश को किस दिशा में ले जा रही है यह नफरत?
कानून का राज खतरे में?
ऐसा लगता है कि देश में कानून का राज खतरे में है। एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी जी चर्च में प्रार्थनाओं में शामिल होते हैं, वहीं दूसरी तरफ असामाजिक तत्व चर्चों और मस्जिदों पर हमले करते हैं। यह दोहरापन देश को कहां ले जाएगा, यह एक बड़ा सवाल है।
गुंडों का बढ़ता आतंक और पुलिस की भूमिका
ऐसा प्रतीत होता है कि देश में गुंडों का एक समूह तैयार हो गया है, जो गले में भगवा दुपट्टा डालकर अपने आप को कानून से ऊपर समझता है। इन्हें कुछ भी करने की खुली छूट मिली हुई है और पुलिस इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।
ये उपद्रवी तत्व खुले आम खुद को हिंदूवादी संगठन (जैसे बजरंग दल या हिंदू रक्षा दल) का जिम्मेदार बताते हैं। पिछले कुछ सालों में ऐसे संगठनों की बाढ़-सी आ गई है। हैरानी की बात यह है कि ये लोग पुलिस की मौजूदगी में चर्चों और मस्जिदों पर हमले करते हैं और पुलिस तमाशाबीन बनी रहती है। न कोई एफआईआर दर्ज होती है, न कोई कार्रवाई। इससे साफ लगता है कि इन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त है।
क्रिसमस और धार्मिक स्थलों पर हालिया हमले
गुंडों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि इस वर्ष क्रिसमस पर इन्होंने पूरे देश में चर्चों पर हमले किए:
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रायपुर और जबलपुर: चर्च में चल रही प्रार्थना के समय पुलिस की मौजूदगी में तोड़-फोड़ की गई।
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दिल्ली: कुछ बच्चों ने सांता की टोपी लगा रखी थी, जिन्हें गुंडों ने सार्वजनिक रूप से धमकाया और भगा दिया।
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उत्तराखंड और हिमाचल: लगातार मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं और मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने से रोका जा रहा है।
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हनुमान चालीसा: चर्चों के सामने ही हनुमान चालीसा का पाठ किया गया।
“सबका साथ-सबका विकास” का दोहरा चेहरा
एक तरफ देश में गुंडागर्दी चल रही है, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी चर्च में जाकर कोरल सुनते हैं। सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री चाहें तो इन घटनाओं को रोक नहीं सकते? क्या वे अपनी सरकारों को कार्रवाई के निर्देश नहीं दे सकते? क्योंकि यह घटनाएं ज्यादातर उन्हीं राज्यों में हो रही हैं, जहां उनकी पार्टी की सत्ता है।
लगता है कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति के तहत चल रहा है। ऊपर से “सबका साथ-सबका विकास” की बात होगी, और नीचे हिंदूवादी संगठन अल्पसंख्यकों को डराकर दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने और हिंदू राष्ट्र के सपने को पूरा करने में लगे रहेंगे।
शीर्ष नेताओं के बयान और संविधान को चुनौती
इस खेल को हिंदूवादी संगठनों के शीर्ष नेताओं के बयानों से समझा जा सकता है। हाल ही में संघ कार्यवाहक दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि मुसलमानों को सूर्य नमस्कार और नदियों की पूजा करनी चाहिए।
यह बयान सीधे तौर पर संविधान को चुनौती देता है, जो हर नागरिक को अपनी मर्जी का धर्म मानने का अधिकार देता है। इसका परिणाम यह होता है कि:
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विचारधारा से प्रभावित गुंडे चर्चों में घुसते हैं।
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छोटी बच्चियों और महिलाओं से अपमानजनक सवाल (जैसे ईसा मसीह कैसे पैदा हुए?) पूछे जाते हैं।
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ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।
अगर स्थिति उल्टी होती तो?
ज़रा कल्पना कीजिए कि अगर हिंदू धर्म के किसी आयोजन में ईसाई या मुस्लिम समुदाय के लोग ऐसे सवाल पूछते, तो क्या होता? पुलिस अब तक सैंकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर चुकी होती, उनकी पिटाई करते हुए जुलूस निकालती और शायद उनके घरों पर बुलडोजर भी चल गए होते।
वैश्विक छवि और प्रवासी भारतीयों पर खतरा
इन उपद्रवियों के वीडियो पूरी दुनिया में देखे जा रहे हैं। आज दुनिया में लगभग 130 ईसाई देश और 57 मुस्लिम देश हैं, जहां करीब 4 करोड़ भारतीय काम करते हैं।
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अगर अमेरिका में गोरे लोग हिंदू त्यौहारों पर ऐसी गुंडागर्दी शुरू कर दें, तो क्या होगा?
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अगर मुस्लिम देश दीपावली मनाने से इनकार कर दें, तो वहां रह रहे भारतीयों की रोज़ी-रोटी का क्या होगा?
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में स्थानीय ईसाइयों ने हिंदुओं का विरोध करना शुरू भी कर दिया है। यह भारत की वैश्विक छवि के लिए खतरनाक है। अब तक दुनिया भारत को एक धर्म-निरपेक्ष और सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में देखती रही है, लेकिन ये घटनाएं उस छवि को धूमिल कर रही हैं।
निष्कर्ष: बर्बादी की राह या विकास?
प्रधानमंत्री जी को पड़ोसी देशों (पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश) की हालत देखनी चाहिए। जो देश अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करने में विफल रहा, वह बर्बाद हो गया।
भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी युवा शक्ति और बाज़ार है। एक विकसित राष्ट्र बनने के सभी संसाधन मौजूद हैं, लेकिन नफरत फैलाने वाले तत्व इसे बर्बाद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी को पहल करके इन असामाजिक तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए और कानून का राज फिर से कायम करना चाहिए, अन्यथा देश की छवि को भारी नुकसान हो सकता है।
– डॉ. शहाबुद्दीन खान
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