मिर्ज़ा ग़ालिब (1797-1869):
‘अंदाज़-ए-बयाँ’ के बादशाह और उर्दू शायरी के महानायक
“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और”
नई दिल्ली/आगरा। उर्दू और फ़ारसी साहित्य का ज़िक्र मिर्ज़ा ग़ालिब के बिना अधूरा है। 27 दिसंबर 1797 को जन्मे मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान, जिन्हें दुनिया उनके तख़ल्लुस ‘ग़ालिब’ से जानती है, उर्दू भाषा के सर्वकालिक महान शायर माने जाते हैं। उन्होंने फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी ज़बान में लोकप्रिय बनाया।
आरंभिक जीवन: आगरा से दिल्ली तक का सफर
मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म आगरा में एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले तुर्क परिवार में हुआ था। उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग ख़ान समरक़न्द (मध्य एशिया) से भारत आए थे।
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बचपन का संघर्ष: 1802 में अलवर युद्ध में पिता मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग की मृत्यु के समय ग़ालिब मात्र 5 वर्ष के थे। उनका पालन-पोषण चाचा ने किया और जीवनयापन चाचा की पेंशन पर निर्भर था।
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विवाह और दिल्ली आगमन: मात्र 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम से हुआ। निकाह के बाद वे दिल्ली आ गए और ताउम्र यहीं रहे।
शाही दरबार और खिताब
मिर्ज़ा ग़ालिब मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि थे। 1850 में बादशाह ने उन्हें कई खिताबों से नवाजा:
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दबीर-उल-मुल्क
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नज़्म-उद-दौला
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मिर्ज़ा नोशा
वे शाही दरबार के इतिहासविद भी रहे और बादशाह के पुत्र मिर्ज़ा फ़ख़रु के शिक्षक भी नियुक्त किए गए।
साहित्य में योगदान: पत्र और शायरी
ग़ालिब ने 11 वर्ष की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। यद्यपि मीर तक़ी “मीर” को भी महान माना जाता है, लेकिन ग़ालिब की शैली (Style) सबसे जुदा थी।
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पत्र लेखन: ग़ालिब के लिखे खत (Letters), जो उस समय प्रकाशित नहीं हुए थे, आज उर्दू लेखन के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ माने जाते हैं।
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ग़ज़लें: उन्होंने पारम्परिक भक्ति और सौन्दर्य रस पर रचनाएँ लिखीं। उन्होंने अपनी पेंशन के सिलसिले में कोलकाता की लंबी यात्रा की, जिसका ज़िक्र उनकी ग़ज़लों में जगह-जगह मिलता है।
अलविदा ‘ग़ालिब’
मिर्ज़ा ग़ालिब 15 फ़रवरी 1869 को इस दुनिया से हमेशा के लिए रुखसत हो गए, लेकिन अपनी शायरी के जरिए वे आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।
“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और”
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