मोहम्मद अली जौहर:
वह स्वतंत्रता सेनानी जिसने लंदन में कहा था- “आजादी दो या मुझे यहीं कब्र दो”
एक महान क्रांतिकारी का सफर (1878 – 1931)
रामपुर/दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मोहम्मद अली जौहर का नाम एक तेज-तर्रार पत्रकार, प्रखर वक्ता और एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी शर्तों पर जीने और मरने का फैसला किया। वे अखिल भारतीय मुस्लिम लीग और जामिया मिलिया इस्लामिया के सह-संस्थापक थे।
माँ ‘बी अम्मान’ की प्रेरणा और शिक्षा
मोहम्मद अली का जन्म 10 दिसंबर 1878 को रामपुर (ब्रिटिश भारत) के एक धनी परिवार में हुआ था। पिता अब्दुल अली खान का साया बचपन में ही (5 वर्ष की उम्र में) उठ गया था। लेकिन उनकी माँ आबादी बेगम, जिन्हें दुनिया ‘बी अम्मान’ के नाम से जानती है, ने अपने बेटों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया।
बी अम्मान ने यह सुनिश्चित किया कि उनके बेटे (मौलाना शौकत अली और मोहम्मद अली) बेहतरीन शिक्षा प्राप्त करें। इसी का नतीजा था कि जौहर ने अलीगढ़ और बाद में ऑक्सफोर्ड (इंग्लैंड) के लिंकन कॉलेज से आधुनिक इतिहास की पढ़ाई की।
पत्रकारिता से जगाई अलख
भारत लौटने पर उन्होंने बड़ौदा सिविल सर्विस जॉइन की, लेकिन उनका मन देश सेवा में था। वे एक बेहतरीन लेखक बने और उन्होंने दो प्रमुख अखबार शुरू किए:
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द कॉमरेड (अंग्रेजी): 1911 में कलकत्ता से शुरू हुआ।
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हमदर्द (उर्दू): 1913 में दिल्ली से शुरू हुआ।
इन अखबारों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ा दी थी।
खिलाफत आंदोलन और गांधीजी से जुड़ाव
1919 में उन्होंने तुर्की के खलीफा के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए ‘खिलाफत आंदोलन’ की शुरुआत की। 1921 में उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर एक बड़ा गठबंधन बनाया। हिंदू-मुस्लिम एकता का यह दौर इतना प्रबल था कि जौहर ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और जेल भी गए।
कांग्रेस से मोहभंग और अलगाव
1923 में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। लेकिन यह साथ लंबे समय तक नहीं चला। 1922 की चौरी-चौरा घटना के बाद गांधीजी द्वारा आंदोलन वापस लेने और बाद में ‘नेहरू रिपोर्ट’ को लेकर उनके मतभेद गहरे हो गए।
जौहर का मानना था कि नेहरू रिपोर्ट में मुसलमानों की राजनीतिक मांगों और प्रतिनिधित्व की अनदेखी की गई है। उन्होंने गांधीजी और मोतीलाल नेहरू पर आरोप लगाया कि वे मुसलमानों को सिर्फ एक ‘अल्पसंख्यक’ मानकर तुष्टिकरण कर रहे हैं। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
लंदन में गोलमेज सम्मेलन: आखिरी दहाड़
मोहम्मद अली जौहर का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था (उन्हें गंभीर मधुमेह था), फिर भी वे 1930 में लंदन में आयोजित पहले गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने गए। वहां उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने जो कहा, वह इतिहास बन गया।
“गुलाम भारत में वापस नहीं लौटूंगा”
लंदन में उन्होंने अंग्रेजों से साफ शब्दों में कहा:
“मैं एक विदेशी देश में मरना पसंद करूंगा, जब तक कि यह एक स्वतंत्र देश है। यदि आप हमें भारत में स्वतंत्रता नहीं देते हैं, तो आपको मुझे यहीं (लंदन में) एक कब्र देनी होगी, क्योंकि मैं गुलाम भारत में वापस नहीं लौटूंगा।”
यरुशलम में अंतिम विश्राम
उनकी बात सच साबित हुई। 4 जनवरी 1931 को लंदन में स्ट्रोक से उनका निधन हो गया। अपनी वसीयत और चाहत के अनुसार, उन्हें गुलाम भारत में नहीं, बल्कि यरुशलम में ‘डोम ऑफ द रॉक’ के पास दफनाया गया। उनकी कब्र पर लिखा है: “यहाँ अल-सैयद मोहम्मद अली अल-हिंदी लेटे हैं।”
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