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गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक

जयपुर

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1 दिसंबर को हुई थी मृत्यु

दिल्ली सल्तनत का पहला शासक

दिल्ली सल्तनत का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था, जिसने भारत में गुलाम वंश की नींव रखी। ‘ऐबक’ का अर्थ होता है- ‘चंद्रमुखी’। 1206 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा गुलाम वंश की स्थापना की गई। उसका शासन काल सिर्फ चार वर्ष (1206 से 1210) तक चला।

राजधानी और राज्याभिषेक

कुतुबुद्दीन ऐबक मोहम्मद गौरी का गुलाम था। गौरी की मृत्यु के बाद उसने स्वयं को लाहौर में एक स्वतंत्र शासक घोषित किया। 24 जून 1206 ई० को लाहौर में उसका राज्याभिषेक हुआ और उसने अपनी राजधानी ‘लाहौर’ को ही बनाया। बाद में उसने दिल्ली को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया, जिससे दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

उपाधियाँ और उदारता: क्यों कहा गया ‘लाखबख्श’?

सिंहासन पर बैठते समय ऐबक ने ‘मलिक’ एवं ‘सिपहसालार’ की उपाधियाँ धारण कीं।

  • कुरान खाँ: उसे ‘कुरान खाँ’ कहा जाता था क्योंकि वह कुरान का बहुत सुरीला पाठ करता था।

  • लाखबख्श: अपनी उदारता और दानी प्रवृत्ति के कारण उसे ‘लाखबख्श’ (लाखों का दान देने वाला) भी कहा गया। इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार, उस समय किसी भी दानशील व्यक्ति को ‘ऐबक’ की उपाधि दी जाती थी।

स्थापत्य कला में योगदान

कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारत में इस्लामी वास्तुकला की नींव रखी:

  1. कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद: दिल्ली में निर्माण करवाया।

  2. अढ़ाई दिन का झौपड़ा: अजमेर में बनवाया।

  3. कुतुबमीनार: दिल्ली के प्रसिद्ध चिश्ती संत “शेख कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी” की याद में कुतुबमीनार का निर्माण शुरू करवाया।

इसके अलावा, उसने दिल्ली में स्थित चौहान कालीन ‘किला-ए-रायपिथौर’ नामक दुर्ग के निकट एक शहर का निर्माण कराया, जिसे दिल्ली के सात शहरों में पहला शहर कहा जाता है। उसके दरबार में हसन निजामी (रचना: ताज-उल-मासिर) और फखरुद्दीन जैसे विद्वान रहते थे।

मृत्यु और उत्तराधिकारी

कुतुबुद्दीन ने इल्तुतमिश को 1197 ई० के अन्हिलवाड के युद्ध के दौरान खरीदा था। 1 दिसंबर 1210 ई० को लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते समय घोड़े से गिरने के कारण कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु हो गई। उसे लाहौर में ही दफनाया गया और उसका मकबरा वहीं स्थित है।

आरामशाह और इल्तुतमिश

ऐबक की मृत्यु के बाद उसके पुत्र ‘आरामशाह’ को शासक घोषित किया गया। आरामशाह एक कमज़ोर शासक था (यह स्पष्ट नहीं है कि वह ऐबक का सगा पुत्र था या नहीं)। उसके विरुद्ध कुछ सरदारों ने षड़यंत्र रचकर शम्सुद्दीन इल्तुतमिश को शासक बनने के लिए आमंत्रित किया, जिसने बाद में गुलाम वंश को मजबूती दी।

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