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हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) और उनकी करामाती टोपी: एक अनकही दास्तान

जयपुर

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जंगे ओहद और पासा पलटने वाला हमला

हज़रत खालिद बिन वलीद का जन्म मक्का मुकर्रमा में हुआ था। जंगे ओहद (सन 3 हिजरी) के समय वे इस्लाम लाने से पहले कुरैश (काफिरों) के एक लशकर की कमान संभाल रहे थे। जब जंग शुरू हुई, तो शुरुआत में मुसलमानों का पल्ला भारी रहा और कुरैश की फौज में भगदड़ मच गई। मुसलमान यह समझे कि उन्होंने मैदान मार लिया है और माले-ग़नीमत (युद्ध में मिला सामान) इकट्ठा करने लगे।

उधर दर्रे (पहाड़ी रास्ते) की हिफाजत के लिए हुज़ूर (स.अ.व.) ने जिन 50 तीरंदाजों को तैनात किया था, वे भी यह समझकर अपनी जगह से हट गए कि जंग खत्म हो गई है, हालांकि उनके सरदार अब्दुल्लाह बिन ज़ुबेर (रज़ि.) ने उन्हें रोका भी था।

खालिद बिन वलीद की रणनीतिक चाल

खालिद बिन वलीद ने इस मौके का फायदा उठाया और पहाड़ी के पीछे से मुसलमानों पर जोरदार हमला कर दिया। हज़रत अब्दुल्ला बिन जुबेर (रज़ि.) और उनके कुछ साथी शहीद हो गए। अचानक हुए इस हमले से जंग का पासा पलट गया। मुसलमानों में अफरा-तफरी मच गई और इसी दौरान यह अफवाह भी उड़ी कि हुज़ूर (स.अ.व.) शहीद हो गए हैं, जिससे मुसलमानों के हौसले पस्त हो गए। इसी जंग में हुज़ूर (स.अ.व.) जख्मी भी हुए थे। यह खालिद बिन वलीद की उस वक्त की जंगी महारत का ही नतीजा था।

इस्लाम कुबूल करना और ‘सैफुल्लाह’ बनना

हज़रत खालिद बिन वलीद ने सफर-उल-मुज़फ्फर (सन 7 हिजरी) में इस्लाम कुबूल किया। वह अपनी पिछली जिंदगी और कुफ्र की हालत में किए गए कामों पर बहुत अफसोस करते थे।

जब उन्होंने हुज़ूर (स.अ.व.) से अपने पछतावे का ज़िक्र किया, तो आप (स.अ.व.) ने फरमाया:

“तुम अपनी पिछली जिन्दगी के गुनाहों पर रंजीदा न हो, क्योंकि इस्लाम कुबूल करने के बाद अल्लाह तआला पिछली जिन्दगी के तमाम गुनाह माफ कर देता है।”

इस्लाम कुबूल करने के बाद वह पूरी ताकत से दीन की सेवा में लग गए। वह एक बेहतरीन योद्धा थे, इसलिए उन्हें ‘सैफुल्लाह’ (अल्लाह की तलवार) का खिताब मिला।

वो ‘कुलाह’ (टोपी) और जीत का राज

जंग-ए-यरमुक के दौरान एक अजीब वाकया पेश आया। हज़रत खालिद बिन वलीद (रज़ि.) की वह टोपी (कुलाह) गुम हो गई, जिसे वह हर जंग में पहना करते थे। टोपी न मिलने पर वह बेहद परेशान हो गए और पूरे लशकर को उसे ढूंढने का हुक्म दिया। आखिरकार वह टोपी मिल गई।

सैनिकों की हैरानी पर उन्होंने उस टोपी का राज बताया: “जब नबी (स.अ.व.) ने उमराह किया था और बाल मुंडवाए थे, तो लोग उनके बाल मुबारक लेने दौड़ पड़े थे। मैंने भी दौड़कर उनके माथे (सामने के सर) के बाल मुबारक हासिल किए और उन्हें इस टोपी में सिलवा लिया। मैं हर जंग में इसे पहनता हूं और अल्लाह हुज़ूर (स.अ.व.) के इन बालों की बरकत से मुझे हर जंग में कामयाबी अता फरमाता है।”

जब पत्नी टोपी लेकर मैदान में पहुंचीं

एक अन्य जंग में जल्दबाजी में वह टोपी घर भूल गए। जब उनकी अहलिया (पत्नी) ने देखा, तो वह खुद टोपी लेकर मैदान-ए-जंग में पहुंचीं। जैसे ही खालिद बिन वलीद ने वह टोपी पहनी, जंग का रुख बदल गया और फतह मिली। उनका दबदबा ऐसा था कि रूमी लश्कर केवल यह सुनकर ही सुलह कर लेता था कि सामने खालिद बिन वलीद आ रहे हैं।

आज हमारे लिए सबक

हज़रत खालिद बिन वलीद अपनी हर जीत का श्रेय हुज़ूर (स.अ.व.) की दुआओं और तबर्रुकात (बाल मुबारक) को देते थे। आज हमारे पास वह तबर्रुकात तो नहीं हैं, लेकिन हुज़ूर (स.अ.व.) की सीरत, सुन्नत और कुरआनी तालीमात मौजूद हैं। हमें दुनिया और आखिरत में कामयाबी हासिल करने के लिए इन पर अमल करना चाहिए।

लेखक: हबीबुल्ला एडवोकेट (जवाहर नगर, जयपुर)

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