कमज़ोरों की मदद: अल्लाह की मदद का ज़रिया
इस्लाम एक रहमत और हमदर्दी का मज़हब है
इस्लाम एक रहमत और हमदर्दी का मज़हब है। इसने समाज के कमज़ोर और बेसहारा तबक़ात, ख़ास तौर पर यतीमों और बेवाओं के हुक़ूक़ और उनकी देखभाल को बहुत ज़्यादा अहमियत दी है।
क़ुरान में यतीमों के हुक़ूक़
क़ुरान-ए-पाक में बार-बार यतीमों के साथ नरमी, उनके माल की हिफ़ाज़त और उनके साथ इंसाफ़ करने का हुक्म आया है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
“पस तुम यतीम पर सख़्ती न करो।” (सूरह अद-दुहा: 9)
नबी की बशारत (शुभ सूचना)
नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), जो ख़ुद एक यतीम थे, उन्होंने यतीम की कफ़ालत (देखभाल) करने वाले को जन्नत में अपने क़रीब होने की बशारत दी है। आपने अपनी दो उँगलियों को मिलाकर फ़रमाया:
“मैं और यतीम की कफ़ालत करने वाला जन्नत में इस तरह (क़रीब) होंगे।” (सहीह बुख़ारी)
बेवाओं की मदद
इसी तरह बेवाओं की मदद और उनकी ज़रूरतों को पूरा करने को अल्लाह की राह में जिहाद करने और दिन भर रोज़ा रखने और रात भर इबादत करने के बराबर क़रार दिया गया है।
इस्लामी समाज की ज़िम्मेदारी
यह सिर्फ़ एक शख़्स की नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने अंदर मौजूद यतीमों और बेवाओं को अकेला और बेसहारा न छोड़े।
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उनकी तालीम
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तरबियत
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सेहत
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माली ज़रूरतों
… का ख़याल रखना एक बेहतरीन इबादत और अल्लाह की रज़ा हासिल करने का सबसे आसान तरीक़ा है। जो समाज अपने कमज़ोरों का ख़याल रखता है, अल्लाह उस समाज पर अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमाता है।
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