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अल्लाह तआला का वजूद (होना)

जयपुर

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अल्लाह तआला के वजूद (यानि वो है या नहीं) के बारे में तीन तरह के लोग अपनी-अपनी राय अलग-अलग रखते हैं और उसे अपनी जिंदगी का एक अहम जुज़ व हासिल समझते हैं, और अपने इस अक़ीदे को सही मानते हैं तथा दूसरे फरीकों के अक़ीदों से इख्तेलाफ़ करते और उनको गलत ठहराते हैं:

1. अहले ईमान और मोमिन (बहुसंख्यक)

यह तबक़ा जिसकी तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है, वो अल्लाह तआला के वजूद और वहदानियत (यानि यकता/अकेला) होने का कायल है। वोह मानता है कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, सिर्फ वोही इबादत के लायक है। वे सिर्फ उसी की इबादत करते हैं और उसी को इस तमाम कायनात का खालिक (पैदा करने वाला) मानते हैं। इसी पर उनका ईमान है।

2. मुशरिक (शिर्क करने वाले)

यह तबका वो है जो जातेबारीतआला (ईश्वरत्व) में दूसरे को शरीक करते हैं और कई खुदा मानते हैं और अलग मौकों पर अलग-अलग खुदाओं की पूजा व परस्तितिश करते हैं।

3. काफ़िर या मुर्तद (इंकार करने वाले)

यह तबका वोह है जो सिरे से ही अल्लाह तआला के होने का इंकार करते हैं। उनका मानना है कि इस कायनात को चलाने वाला कोई नहीं है, यह कायनात अपने आप बनी है

अल्लाह के वजूद पर इमामों की दलीलें

इमामों और बुज़ुर्गों ने अल्लाह की वहदानियत (एक होने) और वजूद पर निम्न दलीलें दी हैं:

  • इमाम राज़ी रह. अ. (सूरह बक़रा की आयत पर दलील): उन्होंने दलील दी कि ज़मीन और आसमान की अलग-अलग शक्ल-सूरत, रंग, मिजाज और अलग-अलग नफा/नुकसान पहुंचाने वाली कुल चीज़ें, और उनका खास हिकमत से होना इस बात का सबूत है कि इनके खालिक का वजूद है और उसकी अजीमुशान कुदरत, हिकमत और जबरदस्त रौब व दबदबा है।

  • तफसीर इब्ने कसीर (खानाबदोश की दलील): एक जाहिल खानाबदोश ने जवाब दिया, “अगर मेंगनी से ऊंट मालूम हो सकता है और पांव के निशान देखकर कोई आदमी गया है, यह मालूम हो जाए, तो क्या यह बुर्जों वाला आसमान, यह रास्तों वाली ज़मीन और मौजें व लहर वाले समन्दर अल्लाह तआला के बारीकी, इख्तियार और खबरदार होने पर दलील नहीं हो सकते?”

  • हज़रत इमाम मालिक रह. अलैह.: उन्होंने बादशाह हारून रशीद को फरमाया, “ज़बानों का जुदा-जुदा होना, आवाजों का अलग-अलग होना (जैसा कि एक इंसान की आवाज दूसरे से नहीं मिलती है) और इंसानों की शक्लों व नगमों का अलग-अलग होना साबित करता है कि खुदा तआला का वजूद है।”

  • हज़रत इमाम अबू हनीफा रह. अलैह. (किश्ती की मिसाल): उन्होंने सवाल करने वाले देहरियों (काफिरों) को एक किश्ती की मिसाल दी जो बिना मल्लाह या मुंतजिम के खुद-ब-खुद तूफान वाले समन्दर में आ जा रही है। जब उन्होंने इसे बेवकूफी कहा, तो इमाम साहब ने फरमाया कि तुम्हारी अक्ल में यह तो आ गया कि एक किश्ती बगैर चलने वाले के न चल सके, मगर यह समझ में न आया कि यह सारी दुनिया, आसमान और ज़मीन को चलाने वाला कोई मालिक, हाकिम और खालिक न हो? (इस जवाब पर वे हक्के-बक्के हो गए और ईमान में दाखिल हो गए)।

  • हज़रत इमाम शाफयी रह. अ. (तूत के पत्ते की मिसाल): उन्होंने जवाब दिया, “तूत के पत्ते एक जैसे हैं, मगर जब उसे कीड़े, मक्खी, गायें, बकरियां और हिरण खाते हैं, तो उनसे रेशम, शहद, दूध, मेंगनियाँ और मुश्क पैदा होता है। क्या यह इस अम्र की साफ़ दलील नहीं कि एक पत्ते में यह अलग-अलग खासियत और चीज़ें पैदा करने वाला कोई है, और उसी को हम अल्लाह मानते हैं।”

  • हज़रत इमाम बिन हम्बल रह. अ. (अंडे की मिसाल): उन्होंने अंडे को एक “मज़बूत किला” बताया, जो चारों तरफ से बंद है, फिर उसमें खालिके कायनात (अल्लाह) एक जानदार, आँखों वाला, बोलता चलता, खूबसूरत बच्चा पैदा कर देता है। यह दलील है खुदा के वजूद और उसकी तौहीद (अकेला होने) पर।

बुजुर्गों का निष्कर्ष

बुजुर्गों का मक़ूला है कि आसमानों की बुलंदी, चमकीले सितारों, मौजें मारते समन्दर, ऊँचे पहाड़ों, खेतों और बागों की सब्जियों, फलों और फूलों पर गौर करो। ज़मीन एक, पानी एक, लेकिन शक्लें-सूरतें, खुशबूएँ, रंगत, ज़ायका और फायदा अलग-अलग। यह तमाम मसनूआत (रचनाएं) तुम्हें नहीं बतातीं कि इनका साने (बनाने वाला) कोई है? यह सारी मखलूक अपने खालिक की हस्ती, उसकी ज़ात और उसकी तौहीद पर दलालत नहीं करती?

अबू नवास ने बारिश और उससे दरख्तों के पैदा होने, और हरी शाखों पर खुश जायका मेवों के लगने को अल्लाह के वजूद की काफी दलील बताया।

इब्नूल मोतज़िल का कौल है कि “अफसोस! लोग अल्लाह तआला की नाफरमानी और उसकी ज़ात के झुठलाने पर दिलेरी कर जाते हैं हालांकि हर चीज उस परवरदिगार की हस्ती और उसके लाशरीफ़ होने की गवाही देती है।”

हमारा इक़रार

हमारा यह इक़रार में अक़ीदा है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं। उसके सिवा इस तमाम कायनात को पालने, पोसने और हिफाज़त करने वाला कोई दूसरा माबूद नहीं है। ए दुनिया के लोगों सुन रखो कि:

  • हमारा तवक्कुल और भरोसा उसी पर है।

  • हमारी इल्तिज़ा उसी से है।

  • हमारा सजदा रेज़ होना और पस्त होना उसी के सामने है।

  • हमारी उम्मीदों का सहारा व आसरा, हमारा पनाह लेने का ठिकाना बस अल्लाह तआला ही है।

अल्लाह हम सब को अपने करम व फ़ज़ल से उसको ज्यादा से ज्यादा याद करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।

(माखूज़ इबने कसीर तफ़सीर)

हबीबुल्लाह, एडवोकेट जवाहर नगर, जयपुर

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