चुनावों में धांधली लोकतंत्र लिए खतरा
बिहार चुनाव का पहला चरण 6 नवंबर को पूरा हो गया। लेकिन इस पहले चरण में वोटिंग में धांधली की घटनाएं बड़ी संख्या में नजर आयी। चुनावों में धांधली देश के लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाता है। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह देश में निष्पक्ष, भयमुक्त एवं साफ सुथरे चुनाव सम्पन करवाये। देश के दबंग पूर्व-चुनाव आयुक्त टीएम शेषन आज भी निष्पक्ष चुनाव के लिए याद किए जाते हैं। लेकिन वर्तमान में चुनाव आयुक्त आखें बंद करके कुर्सी पर बैठे हैं। चुनाव आयुक्त पर पूरा विपक्ष चुनावों में धांधली और एक पार्टी के पक्ष में काम करने का आरोप लगा रहा है। फिर भी चुनाव आयोग लगातार चुनावों में धांधली की अनदेखी कर रहा है। जब चुनाव आयोग लगातार चुनावों में धांधली की अनदेखी कर रहा है तो कैसे निष्पक्ष और बिना हेराफेरी के चुनाव हो सकते हैं। ऐसा ही हाल बिहार विधानसभा चुनाव में रहा। चुनाव के पहले चरण में कई स्थानों पर मतदाताओं को घरों से निकलने तक नहीं दिया। कई नेताओं ने दो-दो बार मतदान किया तो कई स्थानों पर ईवीएम बदलने की सूचनाएं आ रही है। कुछ जगहों पर सुरक्षाबलों ने भी मतदाताओं पर वोट नहीं करने का दबाव बनाया। वोटिंग के दौरान कुछ ऐसे युवक भी देखे गए जिनका नाम संबंधित बूथ क्षेत्र की मतदाता लिस्ट में था ही नहीं, फिर भी मतदान करने की कोशिश कर रहे थे। चुनावों में धांधली होना और चुनावो में धांधली को नहीं रोक पाना देश के चुनाव आयोग की नाकामी है। देश में चुनाव आयोग चुनाव में धांधली की घटनाओं पर क्यों चुप्पी साधे हुए है समझ से परे है। क्या विपक्ष जो चुनाव आयोग पर एक पार्टी के पक्ष में काम करने का आरोप जो लगा रहा है, वह सही है? चुनाव आयोग के लचीलेपन और चुनाव की निष्पक्ष प्रकिया पर सख्ती नहीं करना तो शक पैदा करता है। जिस देश में निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है, वहां धीरे-धीरे लोकतंत्र का हास हो जाता है। बेईमानी से जीतने वाले नेता और राजनीतिक दलों में तानाशाही पनपने लगती है। तानाशाह सरकार और नेता कभी किसी देश का फायदा नहीं कर पाता है। तानाशाह नेता और सरकार सिर्फ लोगों की एवं विपक्ष की कमियां गिनाने और अपना घर भरने में ही पूरा समय गंवा देते हैं। हमारे देश में अभी पूरी तरह तानाशाही नहीं पनपी है और पनप भी नहीं सकती। क्योंकि हमारा देश विभिन्न धर्मों, वर्गों, जातियों, संस्कृतियों, भाषाओं और महापुरुषों का देश है, जहां एक विचार को सबके ऊपर नहीं थोपा जा सकता है। देश में तानाशाही और विचार थोपने की कई बार असफल कोशिश हुई, लेकिन सफल नहीं हुई। वर्तमान में भी ऐसा ही हो रहा है। लेकिन देश के मजबूत सेक्यूलर तानेबाने के सामने देश को कभी तोड़ा नहीं जा सकता, हां कुछ कमजोर जरूर किया जा सकता है।
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