बद से बदतर होते जा रहे हैं शिक्षा के हालात
भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा नाम कमाया है और विश्वगुरु होने का भी दावा अक्सर सुनने में आता है, लेकिन अब भारत में धीरे-धीरे शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। प्राचीन काल में आश्रमों में शिक्षा होती थी, नालन्दा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय भी यहाँ हुए। कालान्तर में मदरसों और मस्जिदों में यह कार्य होने लगा। अंग्रेजों के समय से आधुनिक शिक्षा पद्धति की नींव पड़ी। बाद में अनेकानेक शिक्षण संस्थान स्थापित हुए जिनमें पढ़े हुए कितने ही विद्यार्थी क्रान्तिकारी बने और भारत के स्वाधीनता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान दिया। आज भी अनेकानेक सरकारी, अर्द्धसरकारी और निजी शिक्षण संस्थान स्थापित होते जा रहे हैं। सरकारों के पास या तो साधन-संसाधन कम पड़ जाते हैं या इच्छा शक्ति कि सरकारी विद्यालय निजी विद्यालयों से कमतर साबित होते जा रहे हैं और धीरे-धीरे बंद कर दिये जाते हैं या मर्ज कर दिये जाते हैं।
इस लेख में जिस समस्या पर खास चर्चा की जा रही है, वह यह है कि आजकल कई विद्यालयों और महाविद्यालयों में अध्यापकों ने पढ़ाना बंद कर दिया है। वे अपने लिखे हुए नोट्स की कॉपी व्हाट्सएप, यू-ट्यूब या मेल पर अपने विद्यार्थियों को भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।
एक समय तक शिक्षा का स्तर, वह चाहे सरकारी संस्थान हो या निजी, सभी में अच्छा था। बाकायदा कक्षायें लगती थीं, अध्यापक अध्ययन करके आते थे, छात्र कक्षा में सवाल-जवाब करते थे, अध्यापक भी सवाल-जवाब करते थे, पुस्तकालय रौनक रहते थे। छात्र परिश्रम करते, परीक्षायें देकर पास होते और नौकरी या कोई और काम-धन्धा करते।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से, खास कर जब से मोबाईल में नई-नई तकनीकी आई है; यह सब समाप्त-सा हो गया है। अध्यापक कक्षायें नहीं लेते हैं, खासकर निजि क्षेत्र के स्कूलों और कॉलेजों में, छात्र एक दूसरे को नोट्स साझा करते हैं, जो आमतौर पर उनके सीनियर्स के होते हैं जो वे स्वयं के पास होने के लिये बनाते हैं। शिक्षा की मुख्य प्रक्रिया, जिज्ञासा, पढ़ना-पढ़ाना, समझना-समझाना और तर्क-वितर्क ही समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में अनुमान लगा सकते हैं कि कैसे विद्यार्थी तैयार होंगे? सरकारी विद्यालयों की तो बात समझ में आती है कि पर्याप्त अध्यापक नहीं होने के कारण बच्चे पास होने के लिये कोचिंग संस्थानों में जाते हैं, लेकिन निजि विद्यालयों के बच्चे भी कोचिंग जाते हैं जो कि अभिभावकों पर दोहरी मार है। दुखद स्थिति तो यह है कि जो अध्यापक किसी निजि विद्यालय में पढ़ाते हैं वे ही अपने कोचिंग संस्थान में भी उन्हीं विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं और नोट्स व्हाट्सएप, यू-ट्यूब या मेल पर भेज देते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार होते रहना चाहिये, पुरानी पद्धतियां, विधियां और आउटडेटेड सेलेबस हटाकर नया सेलेबस आना चाहिये, लेकिन जिज्ञासा, पढ़ने-पढ़ाने, समझने-समझाने और तर्क-वितर्क की प्रक्रिया समाप्त नहीं होना चाहिये। ये सब नियमित कक्षा में ही संभव है जिसमें दोनों तरफा संवाद होता है, यह किताबों और नोट्स से यह कार्य नहीं होता है।
अतः शिक्षा में भले ही नवाचार हो, लेकिन छात्र-शिक्षक संवाद समाप्त नहीं होना चाहिये, ताकि अच्छे विद्यार्थी निकल सकें।
डॉ. श्याम सुन्दर बैरवा, भीलवाड़ा 8764122431
Disclaimer
Royal Patrika is an independent news portal and weekly newspaper. Content is published for informational purposes only. Royal Patrika does not take responsibility for errors, omissions, or actions taken based on published information.
Royal Patrika एक स्वतंत्र समाचार पोर्टल और साप्ताहिक समाचार पत्र है। यहां प्रकाशित सामग्री केवल सूचना के उद्देश्य से है। प्रकाशित जानकारी के आधार पर लिए गए किसी भी निर्णय, त्रुटि या नुकसान के लिए Royal Patrika जिम्मेदार नहीं होगा।
